संदेश

अक्टूबर, 2024 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

निकम्मा

 "देखिए बाबूजी, अब हमारा एक साथ रहना मुश्किल लगता है। अरे दो  कमाएं और तीसरा बैठ खाएं, यह कहां का न्याय है? मैं तो यही कहूंगी कि आप  बंटवारा कर दें । शायद  छोटे देवर जी के माथे पर  जिम्मेदारियां आए तो सही राह भी पकड़ लें।" "बड़ी दीदी ठीक ही कहती है, हम दोनों के पति पूरा दिन दुकान में जी तोड़ मेहनत करते हैं और एक  देवर जी हैं जिन्हें अपनी दोस्तो और अय्याशियों से ही फुर्सत नहीं। अरे भला हम कब तक इन सब का भार उठाएंगे?"इस तरह छोटी बहू ने भी बड़ी बहू की बातों का समर्थन किया। दोनों के पति भी सर झुकाकर चुपचाप खड़े हो अपनी पत्नियों की बातों का मूक समर्थन कर रहे थे।" ठीक है,मैं देखता हूं "कहकर सेठ गिरधारी लाल ने यह पारिवारिक बैठक बर्खास्त  की। गिरधारी लाल जी के परिवार में उनके तीन बेटे, बहुएं और उनके बच्चे थे। जमा जमाया पारिवारिक व्यवसाय था, जिसे उनके  बड़े और मंझले बेटे आगे बढ़ा रहे थे। समस्या के मूल में था उनका छोटा बेटा रतन। एक नंबर का निकम्मा और अय्याश। अच्छे-अच्छे कपड़े पहनना, अच्छा खाना और दोस्तों के साथ सारा दिन आवारागर्दी करना यही उसका व्यवहार था। ...

बैसाखी

 मैं अपने ऑफिस में बैठा कुछ जरूरी फाइलें निपटा रहा था। दरवाजे पर किसी ने नौक किया। सर क्या मैं अंदर आ सकती हूं? जी हां । मेरे कहने पर  एक साधारण किंतु शालीन सी दिखने वाली महिला ने अपनी 8 /9 साल की बच्ची के साथ कमरे में प्रवेश किया। उसे मासूम बच्ची के दोनों हाथों में बैसाखियां थी। मैंने उन दोनों को सामने रखी कुर्सियों पर बैठने का इशारा किया। वह महिला तो सामने रखी कुर्सी पर बैठ गई किंतु बच्ची ने मुस्कुरा कर धन्यवाद कहा और वह खड़ी ही रही।"जी कहिए मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूं?","यह मेरी बेटी सलोनी है। ऐसा नहीं है कि यह बचपन से ही अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो सकती जब यह 4 साल की थी,  तभी इसे पोलियो की बीमारी ने जकड़ लिया ।"इसकी पढ़ने लिखनेमें काफी रुचि है। मैं घर पर इसकी पढ़ाई की व्यवस्था कर रखी है। अब यह स्कूल जाने की जिद कर रही है मैंने एक दो स्कूलों में बात किया लेकिन उनका कहना है कि यह बाकी बच्चोंके के साथ सामंजस्य नहीं बिठा पाएगी।""सर क्या आप मुझे अपने स्कूल में एडमिशन देंगे?" मां की बात पूरी होने से पहले ही सलोनी पूछ बैठी। हां बेटा ,क्यों नहीं? मैं...

बदलाव

देखो मां, अब मैं तुम्हारी एक नहीं सुनने वाला। अब तुम हमारे साथ शहर चल रही हो बस। लेकिन बेटा मैं वहां जाकर क्या करूंगी ? मां तुम समझती क्यों नहीं तुम यहां अकले रहती हो हमें भी तुम्हारी चिंता लगी रहती है। तुम हमारे साथ रहोगी तो मैं भी निश्चित रहूंगा और क्या तुम्हारा मन नही करता अपनी पोती के साथ खेलने का। इस बार बेटे  के तर्कों के आगे सुमन जी की एक न चली और उन्हें बेटा बहू के साथ शहर जाकर रहने का फैसला लेना पड़ा। सुमन जी एक साधारण, मेहनती और अच्छी महिला थी, जो एक छोटे से गांव में अपने पति की मृत्यु के बाद अकेले रहती थी। उनके बेटे, रवि ने कुछ साल पहले शहर में अच्छी नौकरी पकड़ ली थी, औरशादी के बाद वह वहीं बस गया था। अब वह अपनी पत्नी मीना  और चार साल की बेटी के साथ शहर में  रहता था। रवि ने कई बार मां को अपने पास रखने की कोशिश की, लेकिन सुमन देवी के  लिए गांव से दूर जाना आसान नहीं था।  सुमन देवी का शहर में पहला दिन थोड़ा सा असहज रहा। शहर की भाग-दौड़, ऊँची-ऊँची इमारतें, और तेज़ रफ़्तार जिंदगी उनके लिए बिल्कुल नई थी। गाँव की सादगी और खुली हवा की जगह, यहाँ की चहल-पहल और ट...

रिश्ता

जानकी निवास में जानकी जी अपने दो बेटों और बहुओं के साथ रहती थी ।सुमन बड़ी बहू थी और राधिका छोटी बहू।   दोनों आपस में बहुत प्यार और सम्मान के साथ रहती थीं।सुमन स्वभाव से शांत, समझदार और धैर्यवान थी। उसने पुरे घर  को बहुत अच्छे से संभाला हुआ था।क्योंकि वह जेठानी थी और घर की बड़ी बहू के रूप में सभी उस पर भरोसा करते थे। वह हर काम को ध्यानपूर्वक और पूरी मेहनत से करती थी। वहीं, राधिका छोटी थी और चुलबुली, ऊपर से उसकी जॉब।  वैसे तो वह  सुमन की मदद करती थी लेकिन जब भी सुमन उसे कोई नया काम सिखाने  की कोशिश करती।"दीदी, मैं आपके जैसा कहां कर पाऊंगी? मैं तो बस आपकी मदद ही कर दूंगी आप ही कर लो।"। इस तरह वह कोई भी जिम्मेदारी लेने से दूर भागती। सुमन इस बात से परेशान हो जाया करती। एक दिन जानकी जी के पास उनकी बेटी नेहा का फोन आता है। जो कि अपने पति के साथ मुंबई में रहती थी।"मां मेरे ससुर जी  के किसी  रिश्तेदार की बेटी की शादी है। वे लोग हमारे शहर में ही रहते हैं। मैं तो नहीं आ पाऊंगी लेकिन मेरे सास, ससुर, जेठ, जेठानी और नंद सभी लोग शादी को अटेंड करेंगे। अगले सप्ताह...

ममता

करीब एक घंटे से अधिक समय से ट्रेन एक छोटे स्टेशन पर खड़ी थी। ट्रेन में बैठे-बैठे समीर का धैर्य जवाब दे रहा था। आजिज होकर वह अपनी सीट से उठ खड़ा हो गया। वह पता लगाना चाहता था कि आखिरकार, ट्रेन इतनी देर से एक ही जगह पर क्यों खड़ी है? वह अपनी सीट से उठकर गेट के पास गया। उसने बाहर देखा कि यहां तो बारिश हो रही है। फिर,समीर वापस अपनी सीट पर जाकर बैठ गया और अपने सिर के नीचे बैग रखकर लेट गया।  उसे थोड़ी ठंड भी लग रही थी।मगर करता क्या शॉल तो उसने लिया नहीं था।काफी देर बाद उसे धीरे-धीरे नींद लगने लगी थी। अचानक एक महिला ने उसकी बाजू को हिलाते हुए उसकी नींद उड़ा दी। वह उठकर बैठ गया। सामने देखा तो एक अधेड़ औरत  मैले-कुचले और गंदे कपड़े पहने हुई थी और अपने हाथ में उसका हैंडबैग पकड़ी हुई थी। ट्रेन स्टेशन से बाहर निकल चुकी थी और अपनी रफ्तार पकड़ चुकी थी। नींद में आदित्य को इस बात की तनिक भनक भी नहीं लगी कि कब उसका हैंडबैग उसके सिर के नीचे से फिसल कर नीचे फर्श पर गिर गया था। समीर ने फटाक से अपना बैग उस महिला के हाथ से ले लिया और चेक करने लगा कि कहीं उसका पर्स और अन्य सामान गायब तो नहीं है। ज्य...

छोटी बहू

 "जीजी, वह हमें रवि के लिए लड़की देखने सहारनपुर चलना है। ""हां तो मैं इसमें  क्या करूं? तुम्हारा काम तुम जानो। तुम्हारा बेटा है उसके लिए लड़की देखने में मेरा क्या काम।"अरे ऐसे कैसे? आप उसकी बड़ी मां है, इस घर की सबसे बड़ी।तो आपका चलना भी उतना ही जरूरी है। ठीक है, ठीक है। चले चलूंगी, वरना सबको यह कहते देर ना लगेगी की लीला की अपनी कोई  संतान नहीं है तो यह सबकी खुशियों से जलती है। उनकी बात सुनकर 1 मिनट के लिए तो सभी सकते में आ गए। लेकिन अगले ही पल उनकी देवरानी ने चैन की सांस ली कि चलो कम से कम जीजी मानी तो सही। उनकी तो आदत है जली कटी सुनाने की। यह थी लीलावती देवी। तीन भाइयों के संयुक्त परिवार की सबसे बड़ी जेठानी। लीलावती देवी के कोई संतान नहीं थी। और उनका अपनी देवरानियों के बच्चों से कोई विशेष लगाव भी ना था। जबकि इसके विपरीत उनके पति श्याम लाल शर्मा जी अपने भाई के बच्चों से अति स्नेह रखते थे, जो लीलावती देवी को पसंद ना था। उनका माना था कि दूसरों की संतान से भला हमे क्या सुख ? शायद इसी कारण उनके स्वभाव में काफी रूखापन आ गया था। मंझली देवरानी को एक बेटा और एक बेटी थी। बे...