निकम्मा
"देखिए बाबूजी, अब हमारा एक साथ रहना मुश्किल लगता है। अरे दो कमाएं और तीसरा बैठ खाएं, यह कहां का न्याय है? मैं तो यही कहूंगी कि आप बंटवारा कर दें । शायद छोटे देवर जी के माथे पर जिम्मेदारियां आए तो सही राह भी पकड़ लें।" "बड़ी दीदी ठीक ही कहती है, हम दोनों के पति पूरा दिन दुकान में जी तोड़ मेहनत करते हैं और एक देवर जी हैं जिन्हें अपनी दोस्तो और अय्याशियों से ही फुर्सत नहीं। अरे भला हम कब तक इन सब का भार उठाएंगे?"इस तरह छोटी बहू ने भी बड़ी बहू की बातों का समर्थन किया। दोनों के पति भी सर झुकाकर चुपचाप खड़े हो अपनी पत्नियों की बातों का मूक समर्थन कर रहे थे।" ठीक है,मैं देखता हूं "कहकर सेठ गिरधारी लाल ने यह पारिवारिक बैठक बर्खास्त की। गिरधारी लाल जी के परिवार में उनके तीन बेटे, बहुएं और उनके बच्चे थे। जमा जमाया पारिवारिक व्यवसाय था, जिसे उनके बड़े और मंझले बेटे आगे बढ़ा रहे थे। समस्या के मूल में था उनका छोटा बेटा रतन। एक नंबर का निकम्मा और अय्याश। अच्छे-अच्छे कपड़े पहनना, अच्छा खाना और दोस्तों के साथ सारा दिन आवारागर्दी करना यही उसका व्यवहार था। जब तक सेठ जी व्यापार संभालते थे, तब तक उसके यह शौक भी आराम से पूरे हुआ करते थे। लेकिन अब व्यापार की कमान भाइयों के हाथों में आ गई थी तो उन्हें उसके ये शौक भारी लगने लगे। भाभियों ने भी उसे ताने देने शुरू कर दिए थे। लेकिन वह तो जैसे अपने कान बंद करके अपनी ही धुन में रहता। और इन सब का खामियाजा भुगतती उसकी बेचारी पत्नी। पूरे दिन बिचारी घर में नौकरानी की तरह काम करती और जेठानियो की धौंस भी सहती। उसने अपने पति को कई बार समझाया कि कोई काम धंधा कर लो नहीं तो दुकान में बड़े भाइयों की मदद ही कर दो।लेकिन कोई असर नहीं। एक बार रतन ने पिताजी से₹50000 की मांग की कि वह दूसरे शहर नौकरी करने जा रहा है। सेठ जी ने सोचा कि सोचा कि की चलो कुछ तो करें। उन्होंने पैसे दे दिए । यह जनाब पैसे लेकर जो गए तो 20 दिनों के बाद ही वापस आ गए ।काफी पूछताछ करने पर पता चला कि दोस्तों के साथ मुंबई की सैर करने लगे थे।अब तो घर में उसकी और फजीहत हो गई।सेठ जी भी दुखी हो गए।इस तरह से सभी लोग अब उसकी ओर से निराश हो गए। 1 दिन की बात है.. संडे का दिन था। बच्चे हॉल में बैठे खेल रहे थे तभी आइसक्रीम वाले की आवाज सुनाई दी । सभी बच्चे आइसक्रीम के लिए मचलने लगे। दोनों बड़ी जेठानिया आई और अपने-अपने बच्चों को आइसक्रीम दिला कर कमरे में चली गई। लेकिन किसी ने भी रतन के 6 साल के बेटे मोनू को आइसक्रीम के लिए पूछा भी नहीं। और बच्चे तो ऊपर से बच्चे ही ठहरे। मैं उसे दिखाकर चिढ़ा चिढ़ाकर आइसक्रीम खाने लगे। मोनू भी आइसक्रीम के लिए मचल रहा था। उसकी मां ने उसे समझाने की बड़ी कोशिश की।"बेटा आइसक्रीम खाने से तेरा गला खराब हो जाएगा,बुखार आ जाएगा, अच्छा,कोई नहीं, अभी आइसक्रीम वाला चला गया है मैं बाजार से तेरे लिए अच्छी वाली आइसक्रीम मंगा दूंगी। तू तो मेरा राजा बेटा है।"लेकिन उस दिन मोनू ने भी जिद पकड़ ली और जमीन पर लोट लोट कर रोने लगा। वहीं पास में सोफे पर बैठकर मोबाइल चलाता हुआ रतन यह सब देख रहा था। वह अपने बेटे को बहुत प्यार करता था।लेकिन उसकी जेब भी तो खाली थी। इधर बेटे को शांत करने के सभी प्रयास विफल होते देखकर रतन की पत्नी को क्रोध आ गया। उसने गुस्से में बच्चे को दो तीन थप्पड़ लगा दिए। बड़ा आया ,आइसक्रीम खाने वाला। इस समय उसके गुस्से में कहे गए बोल और थप्पड़ सीधे रतन के दिल पर लगे। वह एकदम से उठ खड़ा हुआ "मेरा गुस्सा बच्चे पर क्यों उतार रही हो? सारी गलती मेरी है, मैं ही आज तक अपनी जिम्मेदारियां से भागता रहा, लेकिन मैं तुमसे वादा करता हूं कि यह निकम्मा आज से अपनी और अपने परिवार की जिम्मेदारियों को पूरा करेगा। अब तुम दोनों को कोई तकलीफ नहीं होने दूंगा।"यह कहकर वह तेजी से बाहर निकल गया। आज शायद बेटे के आंसुओं ने उसकी अंतरात्मा को जगा दिया था।
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