बदलाव

देखो मां, अब मैं तुम्हारी एक नहीं सुनने वाला। अब तुम हमारे साथ शहर चल रही हो बस। लेकिन बेटा मैं वहां जाकर क्या करूंगी ? मां तुम समझती क्यों नहीं तुम यहां अकले रहती हो हमें भी तुम्हारी चिंता लगी रहती है। तुम हमारे साथ रहोगी तो मैं भी निश्चित रहूंगा और क्या तुम्हारा मन नही करता अपनी पोती के साथ खेलने का। इस बार बेटे  के तर्कों के आगे सुमन जी की एक न चली और उन्हें बेटा बहू के साथ शहर जाकर रहने का फैसला लेना पड़ा। सुमन जी एक साधारण, मेहनती और अच्छी महिला थी, जो एक छोटे से गांव में अपने पति की मृत्यु के बाद अकेले रहती थी। उनके बेटे, रवि ने कुछ साल पहले शहर में अच्छी नौकरी पकड़ ली थी, औरशादी के बाद वह वहीं बस गया था। अब वह अपनी पत्नी मीना  और चार साल की बेटी के साथ शहर में  रहता था। रवि ने कई बार मां को अपने पास रखने की कोशिश की, लेकिन सुमन देवी के  लिए गांव से दूर जाना आसान नहीं था। 


सुमन देवी का शहर में पहला दिन थोड़ा सा असहज रहा। शहर की भाग-दौड़, ऊँची-ऊँची इमारतें, और तेज़ रफ़्तार जिंदगी उनके लिए बिल्कुल नई थी। गाँव की सादगी और खुली हवा की जगह, यहाँ की चहल-पहल और ट्रैफिक ने उसे चौंका दिया। बहू मीना ने सुमन देवी का स्वागत बड़े प्यार से किया, लेकिन उसका  स्वभाव और तौर-तरीका थोड़ा अलग था। मीना आधुनिक कपड़े पहनती थी, सुबह जल्दी उठकर योगा करती थी कामवाली की मदद से घर के कामों को निपटा कर वह ऑफिस चली जाती थी।  वह सुमन देवी का सम्मान तो करती थी, लेकिन दोनों के नजरिए में काफी अंतर था। एक दिन सुबह-सुबह सुमन जी ने बड़े प्यार से सुबह-सुबह नाश्ते में बेटे की पसंद की गरमा गरम पूरियां, दम आलू और धनिया पुदीना  की चटनी बनाई। संडे का दिन था ।बाकी लोग देर से सो कर उठे। मीना किचन में आती है.. "अरे मां जी मैं तो आ ही रही थी नाश्ता बनाने। इतना हैवी और ऑयली नाश्ता। हम नाश्ते में दलिया,ओट्स जैसी हल्की चीज खाते है। "यह सुनकर  सुमन जी का चेहरा फीका पड़ गया। -अरे भाई अब कितना डाइटिंग करवाओगी कभी-कभी तो हम अपने पसंद की चीज खा ही सकते हैं, माहौल को हल्का करने के लिए रवि बोल पड़ा।


सुमन देवी के लिए सबसे मुश्किल चीज थी, शहर की रीति-रिवाज और नए तौर तरीकों से सामंजस्य  बिठाना ।गाँव में वह हर सुबह तुलसी पर जल चढ़ाती थी, घर के पास बने बगीचे में काम करती थी, और पड़ोसियों से हँसी-मजाक करती थी। शहर में, उसे सबने कुछ नया सीखना  पड़ा।बहू ने उन्हें इंटरनेट से कुछ सामान ऑर्डर करना सिखाने की कोशिश की लेकिन सुमन देवी को यह सब बहुत मुश्किल लगा।

धीरे-धीरे सुमन देवी ने अपने नजरिए में बदलाव लाने की कोशिश की। उन्हें लगा कि बदलाव जीवन का  एक हिस्सा है अगर बच्चों के साथ सामंजस्य  बिठाना है तो थोड़ी शुरुआत हमें भी करनी होगी। अब वह बहु के साथ बाजार जाने लगी,आधुनिक चीजों की जानकारी लेने लगी। शाम को प्रतिदिन पार्क में टहलने जाने लगी। अपनी हम उम्र महिलाओं से उनकी दोस्ती भी होने लगी थी।  अब उन्होंने वाशिंग मशीन, ओवन और मिक्सर ग्राइंड चलाना भी सीख लिया था। उन्होंने बहू से नए व्यंजन बनाना भी सीख लिया था।इस तरह बहू के छोटे-छोटे कामों में मदद भी करने लगी और उनका मन भी लगने लगा।

एक दिन मीना ने सुमन देवी से कहा" मां अब आप बहुत कुछ सीख गई हैं । मुझे लगा था आपको यहां तालमेल बिठाने में परेशानी होगी लेकिन आपने बहुत जल्दी यहां के तौर तरीकों को अपना लिया।"

सुमन देवी ने मुस्कुरा कर कहा "बेटा बदलाव से भागना नहीं चाहिए। और वक्त के साथ चलना सीखना चाहिए।"इस तरह सुमन देवी ने न केवल शहरी जिंदगी से तालमेल बैठाया बल्कि अपने परिवार के साथ एक नई और खुशनुमा पारी की शुरुआत की।

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