ममता
करीब एक घंटे से अधिक समय से ट्रेन एक छोटे स्टेशन पर खड़ी थी। ट्रेन में बैठे-बैठे समीर का धैर्य जवाब दे रहा था। आजिज होकर वह अपनी सीट से उठ खड़ा हो गया। वह पता लगाना चाहता था कि आखिरकार, ट्रेन इतनी देर से एक ही जगह पर क्यों खड़ी है? वह अपनी सीट से उठकर गेट के पास गया। उसने बाहर देखा कि यहां तो बारिश हो रही है।
फिर,समीर वापस अपनी सीट पर जाकर बैठ गया और अपने सिर के नीचे बैग रखकर लेट गया। उसे थोड़ी ठंड भी लग रही थी।मगर करता क्या शॉल तो उसने लिया नहीं था।काफी देर बाद उसे धीरे-धीरे नींद लगने लगी थी। अचानक एक महिला ने उसकी बाजू को हिलाते हुए उसकी नींद उड़ा दी। वह उठकर बैठ गया। सामने देखा तो एक अधेड़ औरत मैले-कुचले और गंदे कपड़े पहने हुई थी और अपने हाथ में उसका हैंडबैग पकड़ी हुई थी। ट्रेन स्टेशन से बाहर निकल चुकी थी और अपनी रफ्तार पकड़ चुकी थी। नींद में आदित्य को इस बात की तनिक भनक भी नहीं लगी कि कब उसका हैंडबैग उसके सिर के नीचे से फिसल कर नीचे फर्श पर गिर गया था।
समीर ने फटाक से अपना बैग उस महिला के हाथ से ले लिया और चेक करने लगा कि कहीं उसका पर्स और अन्य सामान गायब तो नहीं है। ज्यों ही उसने अपना बैग खोला तो अंदर अपनी मां का शॉल देखकर आश्चर्यचकित रह गया। बैग में सारे सामान व्यवस्थित तरीके से रखे हुए थे। समीर ने बैग से शॉल निकाला और सोचने लगा कि पिछली रात जब वह बिस्तर पर जाने से पहले अपना बैग पैक कर रहा था, तो उसकी मां कैसे अपना शॉल लाई थी और उसे बैग में रखने के लिए जिद कर रही थी। और कह रही थी कि, “अगर बारिश हुई तो बहुत ठंड लगेगी।”
और उसने बैग में जगह नहीं होने की बात कहकर शॉल रखने से मना कर दिया था । मगर, यह शॉल अभी भी उसके साथ था। वह मन ही मन सोचने लगा, “शायद मां ने मेरे सो जाने के बाद इसे वापस रख दिया होगा।”
कुछ वक्त बाद जब समीर पानी लेने उठा, तो उसने देखा कि उसका शरीर तो बुखार से गर्म हो रखा है। खुद को असहाय महसूस करते हुए उसने तुरंत अपनी मां को कॉल किया और बोला, “मां, कल रात तुम मुझे कुछ मेडिसिन का पैकेट देना चाह रही थी…”
इससे पहले कि समीर बात पूरी कर पाता, उधर से उसकी मां बोल पड़ी, “बेटा, तुम्हारे सिर में दर्द है क्या?”
समीर यह जाहिर नहीं करना चाहता था कि उसे बुखार है ।क्योंकि मां यह जानकार बेवजह परेशान हो जाएगी। इसलिए उसने कह दिया, हां मां…।
उसकी मां बोली, ” मैंने तुम्हारे हैंडबैग की सामने वाली जेब में दवा का पैकेट रखा है। तुम उसमें से निकालकर सिरदर्द की एक गोली ले लो। और हां, मैंने पैकेट में बुखार की दवा भी रख दी है, शायद। कुछ खा लो। सुनो, मैंने तुम्हारे बैग में परांठे और आलू की सुखी सब्जी भी रखा है।”
समीर कुछ घंटे बाद सोकर उठा, तो पहले से काफी बेहतर महसूस कर रहा था। जैसे ही वह अपने पैर फैलाने के लिए उठा, तो उसकी नजर गलियारे के पास बैठी एक महिला पर पड़ी। उसने अपने बच्चे को गोद में ले रखा था। खिड़की से ठंडी हवाएं आ रही थीं। उसके शरीर पर पड़े फटे-पुराने कपड़े इस ठंड से बचाने के लिए नाकाफी थे। आदित्य ने गौर से देखा, तो पाया कि अरे! ये तो वही महिला है, जिसने उसे पहले जगाया था और उसका बैग लौटाया था।
न जाने समीर को क्या सूझी उसने बैग से अपनी मां का शॉल बाहर निकाला और ठंड से कांपते बच्चे को ओढ़ा दिया।
उसने देखा कि बच्चा कैसे अब सुकून से सो गया है। समीर सोचने लगा, “वह एक नहीं, बल्कि दो माताओं के ममता और स्नेह की चादर से लिपटा हुआ था। मां के प्यार की तपिश ही कुछ ऐसी है।
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