बैसाखी

 मैं अपने ऑफिस में बैठा कुछ जरूरी फाइलें निपटा रहा था। दरवाजे पर किसी ने नौक किया। सर क्या मैं अंदर आ सकती हूं? जी हां । मेरे कहने पर  एक साधारण किंतु शालीन सी दिखने वाली महिला ने अपनी 8 /9 साल की बच्ची के साथ कमरे में प्रवेश किया। उसे मासूम बच्ची के दोनों हाथों में बैसाखियां थी। मैंने उन दोनों को सामने रखी कुर्सियों पर बैठने का इशारा किया। वह महिला तो सामने रखी कुर्सी पर बैठ गई किंतु बच्ची ने मुस्कुरा कर धन्यवाद कहा और वह खड़ी ही रही।"जी कहिए मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूं?","यह मेरी बेटी सलोनी है। ऐसा नहीं है कि यह बचपन से ही अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो सकती जब यह 4 साल की थी,  तभी इसे पोलियो की बीमारी ने जकड़ लिया ।"इसकी पढ़ने लिखनेमें काफी रुचि है। मैं घर पर इसकी पढ़ाई की व्यवस्था कर रखी है। अब यह स्कूल जाने की जिद कर रही है मैंने एक दो स्कूलों में बात किया लेकिन उनका कहना है कि यह बाकी बच्चोंके के साथ सामंजस्य नहीं बिठा पाएगी।""सर क्या आप मुझे अपने स्कूल में एडमिशन देंगे?" मां की बात पूरी होने से पहले ही सलोनी पूछ बैठी। हां बेटा ,क्यों नहीं? मैं रश्मि मैडम को बुलाकर बच्ची का टेस्ट लेने के लिए कहा ताकि यह डिसाइड किया जा सके कि वह किस क्लास के लायक है? थोड़ी ही देर बाद रश्मि मैडम बच्ची के साथ वापस आती है" सर, सी इस अ ब्रिललियंट चाइल्ड। हम इसका एडमिशन आराम से क्लास 4 में ले सकते हैं।"सभी जरूरी फॉर्मेलिटी  के बाद सलोनी का एडमिशन मैंने अपने विद्यालय  में ले लिया। उसकी मां ने बार-बार हमारा धन्यवाद ज्ञापन किया। मैंने उन्हें कहा कि इसकी आवश्यकता नहीं है क्योंकि विद्यालय बच्चों के पढ़ने के लिए ही बनाए जाते हैं। सलोनी के चेहरे पर गजब का उत्साह दिखाई दे रहा था। अब वह बच्ची अपनी बैसाखियों पर प्रतिदिन हमारे स्कूल आने लगी। मैने यह नोटिस किया था कि कभी-कभी गेम्स के पीरियड में जब सभी बच्चे खेल रहे होते तो सलोनी उनकी और आशा भरी निगाहों से देखती लेकिन अगले ही पल वह मुस्कुरा कर अपनी ड्राइंग शीट निकाल कर मैदान में एक कोने  में चित्रकारी करने बैठ जाती। वह पढ़ाई में भी काफी अच्छा कर रही थी। सभी शिक्षक उसकी प्रशंसा करते थे। शुरू शुरू में बाकी बच्चे बैसाखियों पर आई एक लड़की को देखकर थोड़ा अचंभा करते थे लेकिन धीरे-धीरे सलोनी से सब की दोस्ती हो गई। ऐसे ही समय बीत रहा था 3 साल के बाद मेरा तबादला दूसरे शहर में हो गया। भारी मन से विद्यालय के शिक्षको और छात्रों ने मुझे विदा किया। समय अपनी गति से पंख लगा कर उड़ता गया और अब मैं रिटायर हो चुका हूं। प्रतिदिन की तरह मैं सुबह टहलते समय  सड़क पार रहा था तभी एक तेज गति से आती हुई गाड़ी झटके से  मुझे छूते हुए निकल गई। उसके बाद क्या हुआ मुझे कुछ याद नहीं। आंखे  खुली तो यह एहसास हुआ कि मैं अस्पताल के कमरे में हूं। मैंने उठने की कोशिश की तो पास बैठी नर्स ने कहा, कि आप लेटे रहिए अभी  आपको आराम की जरूरत है । मैं अभी डॉक्टर को बुलाती हूं। थोड़ी देर बाद कमरे में एक युवा लेडी डॉक्टर ने प्रवेश किया"सर, अब आप कैसे हैं? घबराने की कोई बात नहीं, आपको हल्की चोट आई है। मैने उन पर मरहम पट्टी लगा दिया है। आप घबराहट के कारण बेहोश हो गए थे। शाम तक आप घर जा सकते हैं।"धन्यवाद डॉक्टर, मैंने कहा।"धन्यवाद कैसा? यह तो हमारा काम है और वैसे भी आज मैं जो कुछ भी हूं उसमें आपका बहुत बड़ा योगदान है। अगर उस दिन आपने मुझे अपने स्कूल में एडमिशन न दिया होता, तो  शायद मैं इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाती। मैंने तो आपको देखते ही पहचान लिया था ,सर। शायद आपने मुझे नहीं पहचाना । मैं सलोनी, बैसाखियों वाली लड़की।"सलोनी! लेकिन बेटा तुम्हारे पैर..। केवल बैसाखियां छूटी है, पैर पूरी तरह ठीक नहीं हुए मैंने जयपुर फूट्स लगवाए हैं। आज इस बच्ची को पर  बड़ा गर्व महसूस हुआ साथ ही साथ मन में संतोष भी था जो नन्हा पौधा मैंने अपने विद्यालय में लगाया था आज वह वृक्ष बन चुका है और दूसरों को छांव भी दे रहा है। सलोनी ने अपनी निशक्तता को अपनी सफलता के रास्ते में नहीं आने दिया और वह अपने जीवन में आगे बढ़ गई है।

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