छोटी बहू

 "जीजी, वह हमें रवि के लिए लड़की देखने सहारनपुर चलना है। ""हां तो मैं इसमें  क्या करूं? तुम्हारा काम तुम जानो। तुम्हारा बेटा है उसके लिए लड़की देखने में मेरा क्या काम।"अरे ऐसे कैसे? आप उसकी बड़ी मां है, इस घर की सबसे बड़ी।तो आपका चलना भी उतना ही जरूरी है। ठीक है, ठीक है। चले चलूंगी, वरना सबको यह कहते देर ना लगेगी की लीला की अपनी कोई  संतान नहीं है तो यह सबकी खुशियों से जलती है। उनकी बात सुनकर 1 मिनट के लिए तो सभी सकते में आ गए। लेकिन अगले ही पल उनकी देवरानी ने चैन की सांस ली कि चलो कम से कम जीजी मानी तो सही। उनकी तो आदत है जली कटी सुनाने की।






यह थी लीलावती देवी। तीन भाइयों के संयुक्त परिवार की सबसे बड़ी जेठानी। लीलावती देवी के कोई संतान नहीं थी। और उनका अपनी देवरानियों के बच्चों से कोई विशेष लगाव भी ना था। जबकि इसके विपरीत उनके पति श्याम लाल शर्मा जी अपने भाई के बच्चों से अति स्नेह रखते थे, जो लीलावती देवी को पसंद ना था। उनका माना था कि दूसरों की संतान से भला हमे क्या सुख ? शायद इसी कारण उनके स्वभाव में काफी रूखापन आ गया था। मंझली देवरानी को एक बेटा और एक बेटी थी। बेटी ब्याह कर अपने ससुराल चली गई थी और बहु  मीनाक्षी ,उन लोगों के साथ ही रहती थी। उसका व्यवहार ठीक-ठाक ही था लेकिन बड़ी मां के रूखे स्वभाव के कारण वह  उनसे कटी कटी ही रहती थी। और आज बात चल रही थी सबसे छोटी देवरानी के इकलौते बेटे के लिए लड़की देखने जाने की। हमेशा की तरह लीलावती देवी मुंह फुलाए  बैठी थी। और उनकी देवरानियां उन्हें।साथ चलने के लिए मना रही थीं। काफी मान मनुहार के बाद  वह साथ चलने को तैयार हुई थी।







.. आज शर्मा निवास में काफी चहल पहल थी। घर की सबसे छोटे बेटे नीरज का विवाह धूमधाम से संपन्न हो गया और अब तैयारी हो रही थी नई दुल्हन और घर की छोटी बहू शिवानी के स्वागत की। दरवाजे पर दूल्हा दुल्हन की गाड़ी खड़ी है। "बड़ी जीजी  पहले आप दूल्हा दुल्हन का स्वागत कीजिए।"लेकिन लड़के की मां तो तू है। अरे जीजी छोड़िए  भी ।चलिए भी आगे आइए। ठीक है,जैसी तुम सबकी मर्जी। अब बारी मुंह दिखाई की रस्म की थी। सबसे पहले लीला देवी ने हीं मुंह दिखाई की रस्म की। उन्होंने नई बहू को सोने के झुमके दिए। अरे वाह बड़े सुंदर झुमके दिए हैं बड़ी सासू मां ने, वहां बैठी औरतों में से एक ने कहा। हां भई, वह तो मैंने इसीलिए दिए कि कल को लोग यह ना कहें लीला की अपनी कोई  औलाद नहीं तो वह दूसरों की खुशियों से जलती है। इतनी कड़वी बात सुनकर नई बहू का चेहरा उतर गया। बगल में बैठी जेठानी मीनाक्षी ने धीरे से नई दुल्हन के कानो में कहा इनकी आदत है जली कटी सुनाने की तुम जी छोटा ना करो। परिवार की बाकी सभी लोग बहुत अच्छे हैं। शिवानी धीरे से मुस्कुरा दी। सभी रस्मो से निपटने के बाद छोटी बहू अपने कमरे में आराम करने जा रही थी तभी बड़े  ससुर जी वहां आए ।"बहु, तुम अपनी बड़ी  मां की बातों को दिल से ना लगाना। दिल की इतनी बुरी नहीं है। बस उसकी जुबान जरा तीखी है।" जी बाबूजी।





दो-चार दिनों के बाद से छोटी बहू घर के कामकाज करने लगती है । वैसे तो वह कुछ ही दिनों में सबकी खुशियों का ख्याल रखने लगी थी ।सब लोग भी उसे बहुत प्यार करते थे।लेकिन वह अपनी बड़ी सासु मां का विशेष ध्यान रखती। उनकी खाने-पीने , दवाइयां से लेकर पूजा पाठ तक की सारी व्यवस्था छोटी बहू शिवानी ने संभाल लिया।  बड़ी मां बीच-बीच में अपने शब्दों के बाण छोड़ ही दिया करती।"मैं अपना काम खुद कर लूंगी। मुझे आदत है। जा बाकी के  काम देख। वैसे भी कौन सी तू मेरी सगी बहू है।"लेकिन शिवानी उनकी बातो  को अनसुना कर के अपने काम में लगी रहती। ऐसा नहीं था कि लीला देवी मन से बहुत कठोर थी।कभी कभी भोली भाली शिवानी के लिए उनके मन में भी ममता आ जाती थी ।वह मन ही मन सोचती की अगर भगवान ने मुझे भी एक बेटी दी होती तो शायद वह ऐसी ही होती। लेकिन दूसरे ही पल वह फिर से अपने कटु वचनों से शिवानी को झिरक देती। एक दिन शिवानी की सास ने उससे कहा कि "बेटा तू बेकार ही पत्थर से अपना सिर टकरा रही है जीजी का स्वभाव नहीं बदलने वाला।" लेकिन शिवानी अपना काम करती रही। इस बीच शिवानी की सेवा से बड़ी मां के घुटनों के दर्द में  भी काफी आराम हो गया था लेकिन वह कभी यह जाहिर नहीं करती थी कि यह सब शिवानी की सेवा के कारण हुआ है। लेकिन कभी शिवानी यहां  वहां चली जाती तो बड़ी मां मन ही मन बेचैन हो उठती ।शायद उन्हें भी उसकी आदत हो गई थी। ऐसे ही 6 महीने बीत गए।एक दिन छोटी बहू छत से कपड़े उतार कर ला रही थी कि उसका पैर सीढियो पर से फिसल गया और वह गिर गई। आनन फानन  में उसे अस्पताल ले जाया गया। उसके दाहिने पैर में फ्रैक्चर हो गया था। उसके हाथों में भी काफी चोट लगी थी। डॉक्टर ने उसे आराम को कहा था।










थोड़ी देर बाद शिवानी के कमरे में.. तु थोड़ा ध्यान से नहीं चल सकती थी । कितनी चोट लगा ली ।जी वो बड़ी मां..। तभी बड़ी बहू मीनाक्षी शिवानी के लिए खाना लेकर आती है। ला मैं खिला दूं इसे खाना।सभी आश्चर्यचकित। पूरे 1 महीने बड़ी मां ने शिवानी का पूरा ध्यान रखा।  कभी वह शिवानी के लिए फल काट कर लाती है, कभी जूस, कभी आ बिटिया तेरे बाल बना दूं। ऐसा लगता कि उनके अंदर छुपी मां को शिवानी के रूप में बेटी मिल गई हो।और वह अपनी सारी ममता उसपर उड़ेल देना चाहती हैं। साथ ही घर के बाकी सारे लोगों के लिए भी उनका व्यवहार बदल गया  था। अब वह किसी से भी कड़वे वचन नही बोलती। क्योंकि छोटी बहू के रूप में अब उन्हें एक बेटी मिल गई थी जिसने अपनी सेवा भाव से उनके मन की कड़वाहट को हमेशा हमेशा के लिए समाप्त कर दिया था।













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