दुराग्रह
"तुम कुछ भी कहो दीदी, मुझे तो आजकल की पढ़ी-लिखी और नौकरी करने वाली इन लड़कियों पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं है। इनके लिए परिवार का मतलब केवल अपना पति ही होता है। मौका लगते ही पति को लेकर सास ससुर से अलग हो जाती हैं।"नहीं सरिता, रिया ऐसी लड़की नहीं है। वह पढ़ी-लिखी है, मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती है लेकिन मैने तो उसे घर पर अपनी मां की मदद करते भी देखा है।वह तो बड़ी ही प्यारी सी लड़की है। आखिर मेरी सहेली की बेटी है, मैं जानती हूं उसे अच्छे से।"नहीं दीदी ,मै तो कम पढ़ी-लिखी गांव की किसी सीधी साधी लड़की को ही अपनी बहू बनाऊंगी। जो परिवार को जोड़ कर रखेगी और मेरी इज्जत करेगी।ठीक है,जैसी तेरी मर्जी।"कह कर नीमा ने फोन रख दिया। नीमा और सरिता मौसेरी बहनें थीं। दोनों अलग-अलग शहरों में रहती थी आज नीमा ने सरिता के बेटे रोहित के लिए अपनी सहेली की बेटी रिया का रिश्ता बताने के लिए फोन किया था लेकिन सरिता के मन में जाने क्यों ज्यादा पढ़ी लिखी और नौकरी करने वाली लड़कियों के प्रति दुराग्रह का भाव था।उसका बेटा भी एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता था।वह अपने जैसी ही कि...