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मार्च, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

दुराग्रह

 "तुम कुछ भी कहो दीदी, मुझे तो आजकल  की पढ़ी-लिखी और नौकरी करने वाली इन लड़कियों पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं है। इनके लिए परिवार का मतलब केवल अपना पति ही होता है। मौका लगते ही पति को लेकर सास ससुर से अलग हो जाती हैं।"नहीं सरिता, रिया ऐसी लड़की नहीं है। वह पढ़ी-लिखी है,  मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती है लेकिन मैने तो उसे घर पर अपनी मां की मदद करते भी देखा है।वह तो बड़ी ही प्यारी सी लड़की है। आखिर मेरी सहेली की बेटी है, मैं जानती हूं उसे अच्छे से।"नहीं दीदी ,मै तो कम पढ़ी-लिखी गांव की किसी  सीधी साधी लड़की को ही अपनी बहू बनाऊंगी। जो परिवार को जोड़ कर रखेगी और मेरी इज्जत करेगी।ठीक है,जैसी तेरी मर्जी।"कह कर नीमा ने फोन रख दिया। नीमा और सरिता मौसेरी बहनें थीं। दोनों अलग-अलग शहरों में रहती थी आज नीमा ने सरिता के बेटे रोहित के लिए अपनी सहेली की बेटी रिया का रिश्ता बताने के लिए फोन किया था लेकिन सरिता के  मन में जाने क्यों ज्यादा पढ़ी लिखी और नौकरी करने वाली लड़कियों के प्रति दुराग्रह का भाव था।उसका बेटा भी एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में  काम करता था।वह अपने जैसी ही कि...

बचपन

ठीक है बेटा ,जा खेल कर जल्दी आ जाना और कपड़े गंदे ना करना ,और हां सभी के साथ मिलजुल कर खेलना ।किसी से लड़ाई झगड़ा ना कर लेना। ऐसी ही  कई सारी हिदायतों के साथ शोभा ने अपने 5 साल के बेटे रोहित को खेलने के लिए भेजा। लेकिन थोड़ी ही देर बाद रोहित रोता हुआ घर आ जाता है। अरे, क्या हुआ?रो क्यों रहा है तू ?और तेरे घुटनों पर ये चोट कैसे लग गई? मां, मैं गिर गया था। लेकिन कैसे? वह रोहन , दौड़ता हुआ आ रहा था और मुझसे टकरा गया और मैं गिर गया। "कितना खून बह गया मेरे बच्चे के घुटनों से!" बडबडाते हुए शोभा ने उस पर दवाई लगाई और सीधे बिना कुछ सोचे समझे रोहन के घर की ओर बढ़ चली। अपने घर के दरवाजे के पास ही रोहन खेल रहा था। रोहन करीब 7 साल का बच्चा था। शोभा जाते ही रोहन  पर बरस पड़ती है और उसे तेज आवाज में डांटने लगती है।"कैसे गिरा दिया तुमने रोहित को। तुम्हें समझ नहीं आता कि वह तुमसे छोटा है। यही सिखाया है, मां ने तुम्हें।"तभी घर के बाहर से आती हुई तेज आवाज को सुनकर रोहन की मां मंजू भी घर से बाहर निकल आती है। और शोभा को इस तरहअपने बेटे को डांटते हुए देखकर उसे भी गुस्सा आ जाता है।"...

झूमके

 "देखो बहू, मैं तुमसेआखिरी बार पूछ रही हूं। सीधे-सीधे मेरे झुमके वापस कर दो। नहीं तो ,मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।"लेकिन मां जी ,मैंने कितनी बार कहा आपसे की मैं आपके झुमको के बारे में कुछ नहीं जानती। आप मेरा भरोसा क्यों नहीं करती?"अरे ऐसे कैसे कर लूं, मैं तेरा भरोसा? और घर में हम दोनों के अलावा था ही कौन? मैने गौरव और उसके पापा को भी फोन कर दिया है। वह दोनों भी दुकान बंद करके घर आते ही होंगे।"मालती जी लगातार अपनी बहू शिप्रा पर झुमके चोरी करने का इल्जाम लगाती जा रही थी।  शिप्रा के लाख समझाने और सफाई देने का उनके ऊपर कोई असर नहीं हो रहा था। थोड़ी देर में शिप्रा के ससुर राधेश्याम जी और उसके पति गौरव भी दुकान से वापस आ जाते हैं। शहर के बीचो-बीच मार्केट में उनकी  बड़ी सी कपड़ों की दुकान थी। शिप्रा और गौरव की शादी को साल भर होने को आए। मालती जी आए दिन शिप्रा को छोटी-छोटी बातों पर झिड़क दिया करती थी ।कभी कम दहेज लाने की शिकायत, तो कभी साधारण परिवार से होने का ताना। लेकिन आज तो हद ही हो गई। असल में आज सुबह मालती जी को अपनी सहेलियों के साथ महिला मंडल के किसी  कार्यक्रम में जाना...
अभी सुरेश अपनी सीट पर पहुंचा ही था कि उसका फोन बजने लगा ।पॉकेट से निकाल कर देखा तो बड़े भाई रमेश रमेश का फोन था।"अरे मुन्ना तेरी ट्रेन खुल गई क्या? सवेरे मैं तुझे लेने स्टेशन आ जाऊंगा।"सुरेश चाह कर भी बड़े भाई को मना ना कर सका। और केवल हां कह उसने फोन रख दिया। ट्रेन खुल गई और वह अपनी बर्थ पर लेट गया। उसकी आंखों में नींद कहां थी? वह पुरानी यादों में खो गया उसका बड़ा भाई रमेश अपनी पत्नी के साथ गांव में ही रहता था, जबकि वह अपनी पत्नी के साथ शहर में रहता था। सुरेश जब काफी छोटा था तभी उसके पिता की मृत्यु हो गई थी। रमेश ने पिता के समान सुरेश की देखभाल की, उसे पढ़ाया-लिखाया और हर कदम पर उनका साथ दिया। शहर के चकाचौंध में रहते हुए, उनका गांव कम ही आना जाना होता  था। एक दिन सुरेश की की पत्नी ने कहा कि उनके गांव की संपत्ति में भी उनका हिस्सा है, जिसे उन्हें मांगना चाहिए। पहले तो सुरेश ने मना कर दिया लेकिन बार-बार पत्नी के प्रोत्साहन या यू कहे की जिद पर सुरेश ने गांव की संपत्ति अपने हिस्से की मांग करने का निर्णय लिया। गाँव की ओर जाते समय, सुरेश के मन में बचपन की यादें ताज़ा हो गईं। उसे य...

भेद भाव

अपने नित्य के पूजा पाठ आदि से निवृत  होकर सुमित्रा जी,बाहर घर के बरामदे में बैठी ही थीं कि सामने से पड़ोस की सुमन भाभी, उन्हें देख वहां आ जाती हैं। "बधाई हो , काकी जी, सुना आपकी पोती गुड़िया मैट्रिक की परीक्षा में पूरे कस्बे में अव्वल आई है।"हां आई तो है, कल शाम ही परीक्षा का रिजल्ट हुआ है। दोनों मां बेटी खुशी में बावली हुई जा रही हैं।"तो क्या आप खुश नहीं है काकी? अरे आपकी पोती ने आपका नाम रोशन कर दिया।"हां वह सब तो ठीक है, लेकिन है तो लड़की ही,ज्यादा से ज्यादा क्या कर लेगी। दो-चार सालों में उसकी शादी कर देंगे तो दूसरे के घर की हो जाएगी। ऐसे में उसे आगे पढ़ाकर क्यों बेकार का खर्च बढ़ा ना ।अरे, नाम तो मेरा पोता रोशन करेगा।"सुमित्रा देवी ने पास में खेलते हुए 8 साल के पोते मोनू की तरफ इशारा करते हुए कहा।"अब जमाना बदल गया है लड़कियों को मौक दिया जाए तो वह भी कहां से कहां पहुंच रही हैं। "सुमन की बातों को सुनकर सुमित्रा  देवी ने ऐसा मुंह बिचकाया की सुमन ने वहां से उठ जाने में ही अपनी भलाई समझी।" अच्छा काकी मै चलती हूं।" यह थी सुमित्रा देवी, पुराने...

बोझ

 शाम को दफ्तर से लौट कर महिमा जैसे ही घर पहुंचती है, तो ऐसा लगा मानो सभी उसके इंतजार में ही बैठे थे। "अरे,छोटी बहू आ गई !अब जल्दी  से हाथ मुंह धोकर कपड़े बदल ले और सबके लिए गरमा गरम पकोड़े और चाय बना ले। रिया कब से पकौड़े खाने की जिद कर रही है"। सासू मां अपना आदेश सुना ही रही थी कि की जेठानी गरिमा ने बीच में ही टोकते हुए कहा"और हां महिमा मेरे लिए पालक के पकोड़े बनाना मुझे प्याज के पकोड़े पसंद नहीं।"महिमा केवल सिर हिलाकर अपने कमरे में फ्रेश होने चली जाती है। कमरे में जाकर वह सर पकड़ कर बैठ जाती है। और मन ही मन सोचती है की को शुरू हो गया रोज की तरह मेरे आते ही इनकी फरमाइशों का दौर। एक तो आज ऑफिस में इतना काम था कि वह पहले ही काफी थक चुकी थी। बाहर बालकनी में झांका तो उसके कपड़े वैसे ही पड़े हुए थे। जो सुख कर शायद बारिश के छींटे पड़ने से हल्के गीले भी हो गए थे। किसी ने उन्हें उठा कर रखने की जहमत  भी नहीं उठाई थी। खैर महिमा ने अपने कपड़ों को समेटाऔर आकर रसोई में जुट गई। तब तक पति देव और जेठ जी भी ऑफिस से आ चुके थे। जिन्हें आते ही चाय नाश्ते की आदत थी। घर के बेटे थे। लेकि...