बचपन
ठीक है बेटा ,जा खेल कर जल्दी आ जाना और कपड़े गंदे ना करना ,और हां सभी के साथ मिलजुल कर खेलना ।किसी से लड़ाई झगड़ा ना कर लेना। ऐसी ही कई सारी हिदायतों के साथ शोभा ने अपने 5 साल के बेटे रोहित को खेलने के लिए भेजा। लेकिन थोड़ी ही देर बाद रोहित रोता हुआ घर आ जाता है। अरे, क्या हुआ?रो क्यों रहा है तू ?और तेरे घुटनों पर ये चोट कैसे लग गई? मां, मैं गिर गया था। लेकिन कैसे? वह रोहन , दौड़ता हुआ आ रहा था और मुझसे टकरा गया और मैं गिर गया। "कितना खून बह गया मेरे बच्चे के घुटनों से!" बडबडाते हुए शोभा ने उस पर दवाई लगाई और सीधे बिना कुछ सोचे समझे रोहन के घर की ओर बढ़ चली। अपने घर के दरवाजे के पास ही रोहन खेल रहा था। रोहन करीब 7 साल का बच्चा था। शोभा जाते ही रोहन पर बरस पड़ती है और उसे तेज आवाज में डांटने लगती है।"कैसे गिरा दिया तुमने रोहित को। तुम्हें समझ नहीं आता कि वह तुमसे छोटा है। यही सिखाया है, मां ने तुम्हें।"तभी घर के बाहर से आती हुई तेज आवाज को सुनकर रोहन की मां मंजू भी घर से बाहर निकल आती है। और शोभा को इस तरहअपने बेटे को डांटते हुए देखकर उसे भी गुस्सा आ जाता है।"शोभा तुम इस तरह मेरे रोहन को क्यों डांट रही हो? देखो तो कितना सहम गया है वह।"मां को देखकर रोहन दौड़ता हुआ उसके पीछे जाकर दुबक जाता है।"पूछती हो कि डांट क्यों रही हूं?अरे देखो इसने मेरे रोहित को कितनी बुरी तरह से गिरा दिया है।जी में तो आता है कि इसके गालों पर एक थप्पड़ रसीद कर दूं।"इतना सुनते ही मंजू भी अपना आपा खो देती है।हाथ लगा कर तो दिखा मेरे बेटे को,फिर देख मै क्या करती हूं।"देखते देखते बात और बिगड़ने लगती है। छोटा सा कस्बा था , उन दोनों की झगड़े की आवाज से आस पड़ोस के और भी लोग जमा होने लगते हैं। कुछ महिलाएं शोभा को सही बता रही थीं तो कुछ मंजू को।वही कुछ लोग इस तमाशे का आनंद ले रहे थे। घंटे भर से यह तमाशा जारी था।मुहल्ले की एक बुजुर्ग महिला ने मध्यस्थता का प्रयास किया। लेकिन दोनो महिलाएं एक दूसरे के बच्चे की गलती बता रही थी। हार कर शांता काकी ने कहा कि" चुप हो जाओ तुम दोनों। मुझे बच्चों से ही बात करने दो कि आखि़र हुआ क्या था?कहां हैं दोनों ?"लेकिन दोनों बच्चे तो वहां थे ही नहीं। 1 घंटे से चल रहे इस झगड़े के दौरान बच्चे वहां से कब और कहां गए? किसी ने ध्यान ही नहीं दिया। बच्चों को वहां न पाकर उनकी माएं परेशान होने लगी और सभी लोग इधर-उधर उन्हें ढूंढने लगे। तभी उन लोगों ने देखा कि बच्चे थोड़ी दूर पर मैदान में एक पेड़ के नीचे बैठे खेल रहे थे। मंजू गुस्से में अपने बेटे से पूछती है कि "तू इस पेड़ के नीचे क्यों बैठा है?"मम्मी वो रोहित के पैरों पर चोट लगी है ना, इसलिए हम बैठकर खेल रहे हैं"तब तक शोभा भी अपने बेटे से गुस्से में पूछती है कि "तू इस रोहन के साथ क्यों खेल रहा है?थोड़ी देर पहले ही तो इसने तुझे गिराया था ना?"मम्मी रोहन ने मुझे जानबूझकर तो गिराया नहीं था वो तो गलती से मुझे धक्का लग गया था।और आप तो कहती है कि सबसे मिलजुल कर रहना चाहिए।लड़ाई नहीं करनी चाहिए।फिर आप और आंटी आपस में क्यों लड़ रहे हैं? दोनो बच्चों की बातें सुनकर मंजू और शोभा ने सर झुका लिया। शांता काकी ने उन दोनों को समझाया कि "देखो तुम दोनों कब से बच्चों की बात लेकर आपस में लड़ाई कर रही हो,और ये दोनों तुरंत ही घुल मिल कर खेलने लगे। तुम्हें इन बच्चों से सीख लेनी चाहिए।"दोनों ही महिलाओं को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने एक दूसरे से माफी मांगी। बचपन ऐसा ही होता है, हर राग द्वेष और छल कपट से दूर। कभी-कभी बच्चे हमें ऐसी सीख दे जाते हैं जो हमें बहुत कुछ सिखा जाता है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें