बोझ
शाम को दफ्तर से लौट कर महिमा जैसे ही घर पहुंचती है, तो ऐसा लगा मानो सभी उसके इंतजार में ही बैठे थे। "अरे,छोटी बहू आ गई !अब जल्दी से हाथ मुंह धोकर कपड़े बदल ले और सबके लिए गरमा गरम पकोड़े और चाय बना ले। रिया कब से पकौड़े खाने की जिद कर रही है"। सासू मां अपना आदेश सुना ही रही थी कि की जेठानी गरिमा ने बीच में ही टोकते हुए कहा"और हां महिमा मेरे लिए पालक के पकोड़े बनाना मुझे प्याज के पकोड़े पसंद नहीं।"महिमा केवल सिर हिलाकर अपने कमरे में फ्रेश होने चली जाती है। कमरे में जाकर वह सर पकड़ कर बैठ जाती है। और मन ही मन सोचती है की को शुरू हो गया रोज की तरह मेरे आते ही इनकी फरमाइशों का दौर। एक तो आज ऑफिस में इतना काम था कि वह पहले ही काफी थक चुकी थी। बाहर बालकनी में झांका तो उसके कपड़े वैसे ही पड़े हुए थे। जो सुख कर शायद बारिश के छींटे पड़ने से हल्के गीले भी हो गए थे। किसी ने उन्हें उठा कर रखने की जहमत भी नहीं उठाई थी। खैर महिमा ने अपने कपड़ों को समेटाऔर आकर रसोई में जुट गई। तब तक पति देव और जेठ जी भी ऑफिस से आ चुके थे। जिन्हें आते ही चाय नाश्ते की आदत थी। घर के बेटे थे। लेकिन महिमा को ऑफिस से आते ही रसोई घर में लगना पड़ता था। यह नहीं की कोई एक कप चाय ही पूछ ले। जबकि सास, ननंद और जेठानी सारा दिन घर पर ही रहती थी। खैर इन सब से निपटने के बाद वह रात के खाने की तैयारी में जुट गई। और रसोई घर समेटते हुए रात के 11:00 अपने बिस्तर पर जाती है। फिर सुबह 4:00 उठना भी तो होगा ।उसकी शादी को 1 साल हुआ है। उसके ससुर जी काफी पहले ही इस दुनिया से जा चुके हैं। घर में उसके पति और जेठ जी कमाने वाले थे और दोनों भाई मिलकर घर खर्चे चलाते थे।महिमा पढ़ी-लिखी लड़की थी तो सोचा नौकरी करके घर के खर्चों में कुछ हाथ बंटाया जाए आगे जाकर नंद रिया की शादी भी करनी थी जो अभी कॉलेज में पढ़ रही थी। लेकिन उसे क्या पता था की नौकरी करने के बाद उसकी हालत इतनी बुरी होने वाली है। वह घर और बाहर दोनों के दोहरे बोझ से दब जाएगी। सुबह उठकर नाश्ता बनाना, सभी के लंचबॉक्स पैक करके तैयार होते होते कभी तो इतनी देर हो जाती थी कि बेचारी को भूखी ही निकलना पड़ता था। क्या मजाल की कोई लंच बॉक्स पैक करने में भी उसकी मदद करवा दे। सासू मां के अनुसार वह छोटी बहू थीं तो जिम्मेदारियां उसकी थी। और ऐसे भी वह सारा दिन बाहर है तो आराम ही तो करती है ऑफिस में काम ही क्या होता है? उसके के जाने के बाद सारा दिन बड़ी बहू गरिमा ही तो घर संभालती है। तो इसलिए उसके ऑफिस से आते ही गरिमा आराम करने बैठ जाती थी। महिमा को काम करने से परहेज नहीं था लेकिन थोड़ा आराम तो उसे भी चाहिए था। उसका भी शरीर था। उसने इस बारे में एक दो बार अपने पति से भी बात की लेकिन वह सीधा सा जवाब देते "अरे तुम्हारी तरह कितनी औरतें हैं जो घर और बाहर दोनों संभालती हैं। और वैसे भी मैं तुम औरतों के इन नखरों में नहीं पड़ने वाला। "कई बार उसकी जेठानी गरिमा यहां तक कह देती कि "तुम्हारे तो तो भाई बड़े मजे हैं, सुबह बन ठन कर तैयार होकर घर से निकल पड़ती हो और पूरा दिन आराम से बाहर बिताती हो।"लेकिन आज महिमा ने सोच लिया था अब वह और इस दोहरी चक्की में और नहीं पिसने वाली है। अगली सुबह उठते ही वह रसोई के कामों में लग जाती है नाश्ता तैयार करके वह सबका लंच बॉक्स पैक करके दे देती है और खुद चाय का कप लेकर आराम से पीने बैठ जाती है।"अरे बहु, तू अभी तक तैयार नहीं हुई आज तुझे ऑफिस नहीं जाना है क्या?"नहीं मां जी।"क्यों आज किस बात की छुट्टी कर रही हो तुम, फालतू में एक दिन के पैसे कट जाएंगे।"उसके पति ने उसकी और देखते हुए कहा।"मैंने सोचा है कि अब मैं नौकरी नहीं करूंगी।"उसकी यह बात सुनते ही सभी को मानो करंट लग गया हो। सारे लोग आश्चर्य से उसकी ओर देखने लगे। सासू मां ने झल्लाते हुए पूछा"ऐसा क्या हो गया बहू जो तू नौकरी छोड़ रही है।"क्योंकि अब सारा दिन बाहर जाकर घूमने फिरने से अच्छा है कि मैं भी जेठानी जी की तरह घर मे रह कर घर ही सम्हाल लूं। वैसे भी सुबह शाम मैं रसोई घर देखती ही हूं। तो दिन में भी देख लूंगी। कम से कम यह घर बाहर दोनों की दोहरी मार से तो बच जाऊंगी।"उसकी यह बात सुनते जेठानी गरिमा और सासू मां सहित पूरे परिवार के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी और उन्हें घर खर्च के लिए हर महीने महिमा की ओर से मिलने वाली मोटी रकम हाथ से जाती हुई दिखाई देने लगी। सभी उसे समझाने में लग गए।"अरे बहु ऐसे घर में आती लक्ष्मी को नहीं ठुकराते, फिर रिया की शादी भी तो करनी है। और अगर तू काम से थक जाती है तो आज से शाम को गरिमाऔर रिया भी तेरी मदद कर दिया करेगी।" बाकी लोगों ने भी सासू मां की हां में हां मिलाया। महिमा ने भी उनकी बातों पर यकीन किया और ऑफिस चली गई। वह तो खुद अपने घर की आर्थिक रूप से मदद करना चाहती थी लेकिन उसने मजबूर होकर ही काम छोड़ने का फैसला किया था। अब जेठानी गरिमा और नंद रिया भी उसका हाथ बंटाने लगी है और महिमा घर और बाहर में सामंजस्य बिठाने के साथ-साथ थोड़ा समय खुद को भी दे पाती है। जिससे उसका काम अब उसे बोझ नहीं लगता।
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