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दिसंबर, 2024 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अरेंज मैरिज

शालिनी ने जब आंखें खोलीं, तो उसके बगल में एक गिफ्ट बॉक्स रखा था। जिस पर लिखा था, ‘शादी की 25वीं वर्षगांठ की बधाई ’। उस बॉक्स को खोले बिना ही शालिनी अपने जीवन के 25 साल पीछे चली गई। जब उसने अपना एमबीए पूरा किया था और वह अपने सपनों की एक अलग ही दुनिया में रहती थी। शालिनी को लव मैरिज करनी थी, उसे कभी अरेंज मैरिज करनी ही नहीं थी। इसका सबसे बड़ा कारण था, परिवार। उसकाऔर उसकी सहेलियों का मानना था  कि अरेंज मैरिज में परिवार हमेशा दोनों के बीच में आ जाता है।ऊपर से सास बहू की  घर घर की कहानियां इसलिए उसने सोच रखा था कि वह लव मैरिज करेगी और परिवार के साथ तो बिल्कुल नहीं रहेगी। लेकिन सब कुछ हमारे सोचे अनुसार तो होता नहीं।उसे कोई लड़का पसंद आए ,उसके पहले ही घरवालों ने उसकी शादी राजीव से तय कर दी।आखिरकार मां-पापा का मन रखने के लिए ही सही, उसे उनके मनपसंद लड़के से शादी करनी ही पड़ी।हालांकि शादी के पहले शांत और सौम्य स्वभाव वाले राजीव से मिलने के बाद वह उसे ठीक ही लगे लेकिन असल डर तो परिवार का था।खैर,इस तरह से लव मैरिज करने वाली शालिनी की अरेंज मैरिज हो गई। शादी के बाद जब शालिनी की विदाई हुई ...

गुलाबी साड़ी

"मां, मैं थोड़ी देर में बाजार से आती हूं कुछ जरूरी सामान रह गया है। "बोलकर वाणी अपनी स्कूटी की चाबी उठाकर बाजार की तरफ निकल जाती है। रसोई घर में उसके लिए सुखा नाश्ता तैयार करती हुई मां कुछ पूछती उसके पहले ही वाणी  जा चुकी थी।" यह लड़की भी ना बस हवाई जहाज पर सवार रहती है। देखूं ,उसने अपनी पैकिंग पुरी करी है या नहीं।"सोचती हुई स्नेहा बेटी के कमरे की ओर बढ़ती है।  दरअसल स्नेहा की बेटी वाणी का चयन जे.आर.एफ.के लिए हुआ है। वह अपने रिसर्च वर्क के लिए बनारस जा रही है।घर में उसके जाने की तैयारियां चल रहीं हैं। बेटी को कभी खुद से दूर नहीं किया यह सोच सोच कर स्नेहा घबरा रही है। लेकिन उसके उज्जवल भविष्य के लिए भेजना भी जरूरी है।"ये देखो होने वाली प्रोफेसर साहिबा सारे कपड़े बिस्तर पर फैला रखे  हैं। कोई नहीं मैं ही इन कपड़े को उसके बैग में जमा देती हूं।"स्नेहा बेटी के कपड़ों को बैग में रखने लगती है तभी  उसकी नजर एक ऐसे कपड़े पर पड़ती है जिसे हाथों में लेकर उसकी आंखों में आंसू आ जाते हैं और वह अतीत की यादों में खो जाती है।छोटे से कस्बे में स्नेहा अपनी दस साल की बच्ची वाण...

वटवृक्ष

रमेश जी एक छोटे से होटल में मैनेजर का काम करते थे। नेक और सरल स्वभाव वाले रमेश जी होटल में काम  करने वाले कर्मचारियों से बड़े ही सहृदयता से जुड़े हुए थे। होटल में काम करने वाले कर्मचारी भी अपना सुख-दुख उनसे बांटते थे। रमेश जी यथासंभव  उनकी मदद भी करते थे।एक दिन वहां काम करने वाले माली मोहनलाल ने रमेश जी की, "भैया,  मेरा बेटा सूरज आगे पढ़ना चाहता है, लेकिन घर की हालत ऐसी नहीं कि हम उसे पढ़ा सकें। मैंने उसके लिए एक जगह अखबार बांटने के काम की बात कही है।पूरे 4 हजार रुपए  मिलेंगे लेकिन वह है कि तैयार ही नहीं होता।वह कुछ अपना  काम-धंधा शुरू करना चाहता है, लेकिन पैसों का इंतजाम नहीं हो पा रहा। अब आप ही उसे समझाइए।" रमेश ने मोहनलाल की बात सुनी और सूरज से मिलने की इच्छा जताई। अगले दिन सूरज रमेश से मिलने आया। रमेश ने उससे पूछा, "तुम क्या करना चाहते हो, बेटे?" सूरज ने जवाब दिया, "बाबूजी, मैं स्टेशनरी की एक दुकान खोलना चाहता हूं। इससे मेरा खर्चा भी निकलेगा और मैं अपनी पढ़ाई भी जारी रख पाऊंगा। लेकिन इसके लिए पैसे नहीं हैं।"रमेश सूरज की मेहनत और उसके सपने को देखकर बहुत...

उजाला

कहानी लेखन प्रतियोगिता का प्रथम पुरस्कार जाता है... काव्या शर्मा को। और पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। काव्या ने पुरस्कार ग्रहण किया। काव्या को लिखने का बड़ा शौक था। आज कॉलेज में कहानी लेखन की प्रतियोगिता में उसने प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया था। वह अपना अवार्ड लेकर चहकती हुई घर में आती है। मां कितना खुश  होगी यह पुरस्कार देखकर। यह सोचते हुए और घर में प्रवेश करती है लेकिन घर में पसरा सन्नाटा और संजीदा माहौल देखकर वह चुपचाप अपने कमरे में चली गई।  उसकी मां  मालती देवी डाइनिंग टेबल पर  बैठकर सब्जियां काट रही थीं।उनके चेहरे पर फैली नाराजगी देखकर काव्य समझ गई कि आज भाभी को ऑफिस से आने में फिर देर हुआ होगा। "शर्मा निवास" में मालती देवी अपनी बहू निधि और अपनी बेटी काव्या के साथ रहती थीं। मालती देवी के पति का कुछ साल पहले देहांत हो चुका था, और घर की ज़िम्मेदारी अब उनके बेटे रोहित और बहू निधि ने अच्छे से संभाल ली थी। लेकिन सब कुछ होते हुए भी इस घर में एक खामोशी हमेशा बनी रहती थी। सास-बहू के रिश्ते में एक अनकहा फासला था।  निधि एक पढ़ी-लिखी और आत्मनिर्भर महिला थी। शादी के बाद...

नया परिवार

"क्या बात है मां, किसका फोन था?कुछ परेशान दिख रही हो।" हां बेटा ,गांव से तेरे चाचाजी का फोन आया था।जमीन के कुछ जरूरी दस्तावेजों पर मेरे दस्तखत चाहिए।कोई सरकारी मामला है।लेकिन बहू को इस हाल में छोड़ कर जाने को मन नहीं मानता।लेकिन काम भी जरूरी है वरना तुम्हारे चाचाजी इस समय फोन नहीं करते।"मां सारिका की डिलीवरी में भी अभी 15 दिन है, आप गांव चली जाओ लेकिन काम निपटा कर दो-तीन दिन में वापस आ जाना।"शिवम अपनी मां का टिकट करवा देता है और उन्हें शाम वाली ट्रेन में बिठाकर वापस आ जाता हैं।लेकिन सारिका को रात में ही लेबर पेन शुरू हो गये,  शिवम नर्वस सा हो गया।माँ होती तो सब संभाल लेती,वह कैसे करेगा?इस घर में आए उन्हें कुछ ही समय हुआ था इसलिए वे ज्यादा लोगों को जानते भी नहीं थे कि किसी की मदद मांगी जाए।सोच सोच कर वह परेशान हो रहा था।फिर भी उसने अपनी समझ से कुछ जरूरी चीजें एक बैग में रखी जो अस्पताल में काम आ सकती थी।सारिका दर्द के मारे रोने लगी थी।उसकी समझ नही आ रहा था कि वह अपनी कार भी बाहर कैसे निकाले सारिका को इस बीच कौन संभालेगा?तभी सरिका के कराहने की आवाज सुनकर पड़ौस से राधा क...