गुलाबी साड़ी
"मां, मैं थोड़ी देर में बाजार से आती हूं कुछ जरूरी सामान रह गया है। "बोलकर वाणी अपनी स्कूटी की चाबी उठाकर बाजार की तरफ निकल जाती है। रसोई घर में उसके लिए सुखा नाश्ता तैयार करती हुई मां कुछ पूछती उसके पहले ही वाणी जा चुकी थी।" यह लड़की भी ना बस हवाई जहाज पर सवार रहती है। देखूं ,उसने अपनी पैकिंग पुरी करी है या नहीं।"सोचती हुई स्नेहा बेटी के कमरे की ओर बढ़ती है।
दरअसल स्नेहा की बेटी वाणी का चयन जे.आर.एफ.के लिए हुआ है। वह अपने रिसर्च वर्क के लिए बनारस जा रही है।घर में उसके जाने की तैयारियां चल रहीं हैं। बेटी को कभी खुद से दूर नहीं किया यह सोच सोच कर स्नेहा घबरा रही है। लेकिन उसके उज्जवल भविष्य के लिए भेजना भी जरूरी है।"ये देखो होने वाली प्रोफेसर साहिबा सारे कपड़े बिस्तर पर फैला रखे हैं। कोई नहीं मैं ही इन कपड़े को उसके बैग में जमा देती हूं।"स्नेहा बेटी के कपड़ों को बैग में रखने लगती है तभी
उसकी नजर एक ऐसे कपड़े पर पड़ती है जिसे हाथों में लेकर उसकी आंखों में आंसू आ जाते हैं और वह अतीत की यादों में खो जाती है।छोटे से कस्बे में स्नेहा अपनी दस साल की बच्ची वाणी के साथ रहती थी। स्नेहा सिलाई का काम करती थी और बड़ी मेहनत से वाणी को पढ़ाती-लिखाती। उनके पास ज्यादा कुछ नहीं था, लेकिन माँ-बेटी का प्यार ही उनकी असली दौलत थी।
वाणी के पिता का कई साल पहले एक हादसे में निधन हो गया था।उनके जाने के बाद ससुराल वालों ने भी उनसे मुंह मोड़ लिया था।यह तो पति का बनाया हुआ घर था जो मां बेटी के सिर पर छत बनी रही।तब से स्नेहा ने वाणी के लिए खुद को समर्पित कर दिया। वह दिन-रात सिलाई करती और बेटी को एक बेहतर भविष्य देने का सपना देखती।स्नेहा के पास एक गुलाबी साड़ी था, जो उसके पति ने शादी की पहली सालगिरह पर खरीदी थी। वह साड़ी अब उसका सबसे कीमती सामान था। जब भी स्नेहा थक जाती या उदास होती, वह साड़ी अपने कंधों पर डाल लेती। यह उसे हिम्मत और साहस का अहसास कराता, मानो उसमें कोई जादू हो।वाणी को भी वह साड़ी बहुत पसंद थी। वह अक्सर अपनी माँ से पूछती, "माँ, ये साड़ी तुम्हें इतना क्यों पसंद है?"स्नेहा मुस्कुराते हुए कहती, "ये साड़ी मुझे याद दिलाती है कि कठिन समय भी बीत जाता है। जब इसे ओढ़ती हूँ, तो ऐसा लगता है जैसे तुम्हारे पापा मुझे सहारा दे रहे हों।"एक दिन वाणी के स्कूल में वार्षिक उत्सव था। वह बहुत खुश थी क्योंकि उसे कविता प्रतियोगिता में भाग लेना था। लेकिन घर लौटते समय वह उदास दिखाई दे रही थी।स्नेहा ने पूछा, "क्या हुआ बेटा?
तुम उदास क्यों हो?"वाणी ने जवाब दिया, "माँ, मेरी फ्रॉक पुरानी हो गई है। कल सभी बच्चों के पास नई-नई ड्रेसेस होंगी। मैं ऐसा लगूंगी जैसे मैं गरीब हूँ।"बेटी की बात सुनकर स्नेहा का कलेजा मुंह को आ गया। लेकिन वह जानती थी कि वाणी की बात सही थी, लेकिन नई ड्रेस खरीदने के लिए पैसे भी तो नहीं थे। उस रात जब वाणी सो गई, तो स्नेहा ने अपनी गुलाबी साड़ी निकली और उसे देर रात तक देखती रही।अगले दिन, वाणी के लिए एक खूबसूरत नई ड्रेस तैयार थी। स्नेहा ने अपनी साड़ी काटकर उससे ड्रेस बनाई थी। वह जानती थी कि वह साड़ी उसके लिए कितनी कीमती थी, लेकिन वाणी की खुशी उससे भी ज्यादा जरूरी थी।जब वाणी ने वह ड्रेस पहनी, तो वह बेहद खुश हुई। स्कूल में उसने अपनी कविता सुनाई और पहला पुरस्कार जीता। लेकिन जब उसने घर आकर देखा कि स्नेहा की गुलाबी साड़ी गायब है, तो उसे सच्चाई समझ में आ गई।उस रात, वाणी ने माँ के पास जाकर कहा, "माँ, तुमने मेरे लिए अपनी सबसे प्यारी साड़ी क्यों काट दिया?"
स्नेहा ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा और कहा, "बेटा, उस साड़ी में मेरी हिम्मत थी। अब वही हिम्मत मैंने तुम्हें दी है। तुम मेरे लिए सबसे कीमती हो।"नन्हीं वाणी ने अपनी माँ को गले लगा लिया। "अरे मां आप क्या कर रही हो? मैं बैग में कपड़े डाल लूंगी।"बेटी की आवाज सुनकर स्नेहा अपने ख्यालों से बाहर आई। तब तक वाणी ने भी मां के हाथ में अपनी वह ड्रेस देख ली। स्नेहा बेटी की तरफ देखने लगी, वह कुछ पूछती उसके पहले ही वाणी ने मां के हाथों में अपना हाथ रख कर कहा मां मैं यह ड्रेस अपने साथ लेकर कर जा रही हूं, क्योंकि आपकी दी गई हिम्मत मैं हमेशा अपने साथ रखूंगी। और जल्दी ही अपनी पढ़ाई पूरी करके आपके पास लौट आऊंगी। स्नेहा ने अपनी बेटी को गले लगा लिया ऐसा लगा मानो उसका सारा बलिदान आज सफल हो गया।
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