नया परिवार

"क्या बात है मां, किसका फोन था?कुछ परेशान दिख रही हो।" हां बेटा ,गांव से तेरे चाचाजी का फोन आया था।जमीन के कुछ जरूरी दस्तावेजों पर मेरे दस्तखत चाहिए।कोई सरकारी मामला है।लेकिन बहू को इस हाल में छोड़ कर जाने को मन नहीं मानता।लेकिन काम भी जरूरी है वरना तुम्हारे चाचाजी इस समय फोन नहीं करते।"मां सारिका की डिलीवरी में भी अभी 15 दिन है, आप गांव चली जाओ लेकिन काम निपटा कर दो-तीन दिन में वापस आ जाना।"शिवम अपनी मां का टिकट करवा देता है और उन्हें शाम वाली ट्रेन में बिठाकर वापस आ जाता हैं।लेकिन सारिका को रात में ही लेबर पेन शुरू हो गये,  शिवम नर्वस सा हो गया।माँ होती तो सब संभाल लेती,वह कैसे करेगा?इस घर में आए उन्हें कुछ ही समय हुआ था इसलिए वे ज्यादा लोगों को जानते भी नहीं थे कि किसी की मदद मांगी जाए।सोच सोच कर वह परेशान हो रहा था।फिर भी उसने अपनी समझ से कुछ जरूरी चीजें एक बैग में रखी जो अस्पताल में काम आ सकती थी।सारिका दर्द के मारे रोने लगी थी।उसकी समझ नही आ रहा था कि वह अपनी कार भी बाहर कैसे निकाले सारिका को इस बीच कौन संभालेगा?तभी सरिका के कराहने की आवाज सुनकर पड़ौस से राधा काकी दौड़ी आयी,आते ही सारी स्थिति को समझ उन्होंने सारिका को संभाल लिया। काकी उनके साथ ही हॉस्पिटल गयी,सारी रात वही रही,डिलीवरी नॉर्मल ही हुई,पर अगले दो दिन मां के आने तक राधा काकी सारिका के साथ ही डटी रही।मां के आने के बाद काकी अपने घर गयी।सारिका के हॉस्पिटल से घर आने के बाद भी काकी  सारिका और बच्चे के हाल चाल पूछने रोज ही एक बार घर आ जाती।शिवम एक बात नोट कर रहा था कि  काकी के इतना सहयोग करने के बाद भी माँ का व्यवहार काकी के प्रति कुछ रूखा सा है।वे काकी से बात भी बहुत कम करती,बस हाँ- हूँ तक सीमित रहती।मां का यह व्यवहार शिवम के गले नही उतर रहा था,माँ ऐसा क्यों कर रही है भला? काकी ने हमारी कितनी सहायता की।एक









 दिन शिवम के पूछने पर माँ बोली अरे शिवम तू भोला है,तू ऐसी औरतों को नही समझता।देख लेना इस अहसान के एवज में ये ये जो तेरी काकी है ना, कुछ न कुछ डिमांड रख देगी, कौन जाने लाख पचास हजार ही  उधार  कहकर मांग ले।और बाद में वापस ही नहीं करे। मुझे तो शकल देखने से ही गरीब लगती है।शिवम ने कोई उत्तर नही दिया,पर जाने क्यों उसे मां का ऐसा कहना कुछ ठीक नहीं लगा ।कई दिन बाद की घटना हुई कि सारिका  की देखभाल में भागमभाग के चक्कर मे माँ रपटकर गिर गयी,जिससे उनके पैर की हड्डी में हेयर  क्रैक आ गया।।डॉक्टर ने प्लास्टर बांध दस दिनों के लिये बेडरेस्ट बता दिया।ऐसी विषम परिस्थिति में राधा काकी ही काम आयी। काकी ने पूरा घर संभाल लिया था।









अब मां को भी समझ आ गया था कि उसकी काकी के बारे में धारणा गलत थी।एक दिन मां ने बातों ही बातों में उनसे उनके परिवार के बारे मे पूछ लिया। काकी  ने बताया कि उसका एकलौता बेटा तो अमेरिका में बस गया है, मुझे ये घर दे गया है और मुझे ढेर सारे रुपये भेजता है,पर बता  उन रुपयों का मैं क्या करूँ,जब बेटे को भी देख न पाऊं पोते को गोद मे ले न सकूं,मुझ अभागी को मौत भी नही आती।जब से इस शिवम  और सारिका को देखा है ना,बहनजी मुझे इनमें अपना बेटा और बहू ही दिखाई देते हैं और अब तो इन्होंने पोता भी दे दिया है।काकी की कहानी सुन मां की आंखों से पानी बह रहा था,उन्होंने काकी के हाथ को कस कर पकड़ लिया था,सारिका ने बिस्तर से उठकर अपना सिर राधा काकी की गोद मे रख लिया था।शिवम  ने आगे बढ़कर काकी के दूसरे हाथ को दबा कर अपने माथे से लगा लिया,मानो मां की पहली सोच की माफी मांग रहा हो।राधा काकी ऐसी खुश थी – ऐसी खुश थी,जैसे अमेरिका से उनका बेटा बहू और पोता लौट आये हो।और उन्हें उनका  नया परिवार मिल गया हो।

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