वटवृक्ष
रमेश जी एक छोटे से होटल में मैनेजर का काम करते थे। नेक और सरल स्वभाव वाले रमेश जी होटल में काम करने वाले कर्मचारियों से बड़े ही सहृदयता से जुड़े हुए थे। होटल में काम करने वाले कर्मचारी भी अपना सुख-दुख उनसे बांटते थे। रमेश जी यथासंभव उनकी मदद भी करते थे।एक दिन वहां काम करने वाले माली मोहनलाल ने रमेश जी की, "भैया, मेरा बेटा सूरज आगे पढ़ना चाहता है, लेकिन घर की हालत ऐसी नहीं कि हम उसे पढ़ा सकें। मैंने उसके लिए एक जगह अखबार बांटने के काम की बात कही है।पूरे 4 हजार रुपए मिलेंगे लेकिन वह है कि तैयार ही नहीं होता।वह कुछ अपना काम-धंधा शुरू करना चाहता है, लेकिन पैसों का इंतजाम नहीं हो पा रहा। अब आप ही उसे समझाइए।"
रमेश ने मोहनलाल की बात सुनी और सूरज से मिलने की इच्छा जताई। अगले दिन सूरज रमेश से मिलने आया। रमेश ने उससे पूछा, "तुम क्या करना चाहते हो, बेटे?" सूरज ने जवाब दिया, "बाबूजी, मैं स्टेशनरी की एक दुकान खोलना चाहता हूं। इससे मेरा खर्चा भी निकलेगा और मैं अपनी पढ़ाई भी जारी रख पाऊंगा। लेकिन इसके लिए पैसे नहीं हैं।"रमेश सूरज की मेहनत और उसके सपने को देखकर बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने अपनी बचत में से एक छोटी सी रकम सूरज को दी और कहा, "जाओ, इस पैसे से अपनी दुकान खोलो। लेकिन मेहनत और ईमानदारी से काम करना। एक दिन तुम्हारा नाम जरूर होगा।"सूरज ने रमेश के आशीर्वाद से
अपनी स्टेशनरी की दुकान शुरू की। वह दिन-रात मेहनत करता और धीरे-धीरे में उसकी छोटी सी दुकान चल निकली।घटना को कई साल बीत गए।अब रमेश जी रिटायर हो चुके हैं। रिटायरमेंट पर जो थोड़े बहुत पैसे मिले हैं। उनसे बिटिया की शादी निपटाई ,घर का खर्च भी अच्छी तरह चल जाता है। कोई सरकारी नौकरी तो थी नहीं, जो पेंशन का भरोसा हो। लेकिन अब बेटे को पढ़ाई के लिए बाहर भेजना था।"कॉलेज की फीस, हॉस्टल का खर्च, खाने पीने का खर्चा कुल मिलाकर 12 लाख रुपए 4 साल में खर्च हो जाएंगे इतने पैसे कहां से आएंगे जी।"तुम चिंता क्यों करती हो रोहित की
मां? मैं सब संभाल लूंगा।₹200000 मैने रोहित की पढ़ाई के लिए बचत कर रखी है। बाकी के पैसे बैंक से लोन ले लेंगे। मैं कल ही बैंक में जाकर पता करता हूं। अगले दिन बैंक में.... "देखिए मिस्टर रमेश, आपको बैंक से लोन तो जरूर मिल जाएगा लेकिन। उसके लिए आपको एक गारंटर की व्यवस्था करनी होगी।"गारंटर!रमेशजी सोच में पड़ गए।मैनेजर के कमरे से निकलते हुए ऐसा लगा कि कमरे में बैठा हुए एक व्यक्ति बड़ी ध्यान से उनकी ओर देख रहा है। चेहरा तो रमेश जी को भी जाना पहचाना लगा पर उस समय वह अपनी ही परेशानी में थे तो ज्यादा ध्यान नहीं दिया। इधर घर पर..” बैंक वालों ने लोन देने से मना कर दिया अब क्या होगा रोहित के पापा?"तुम चिंता क्यों करती हो शहर में और भी कितने सारे बैंक हैं मैं कल दूसरे बैंक में जाऊंगा।" तभी उनके दरवाजे पर दस्तखत होती है। एक आदमी उनके हाथों मे निमंत्रण पत्र देता है।"जी हमारे मालिक ने आपके लिए भिजवाया है। यह उनकी किताब की नई दुकान की उद्घाटन का निमंत्रण है। उन्होंने आपसे आने के लिए विशेष रूप से विनती की है।"रमेश जी ने निमंत्रण पत्र को उलट-पुलट कर देखा पर उन्हें याद नहीं आया कि यह कि यह किसने भेजा है? हो सकता है कोई पुरानी जान पहचान वाला हो।उद्घाटन के दिन रमेश जी दुकान पर पहुंचे, यह शहर के बीचो-बीच किताबों की एक भव्य दुकान थी।तो एक आदमी ने आगे बढ़ कर उनके पैर छूते हुए कहा, "बाबूजी, यह सब आपकी वजह से संभव हो पाया। आपने मुझ पर विश्वास किया और मुझे
वह मौका दिया, जिसकी मुझे जरूरत थी। आज शहर में यह मेरी तीसरी दुकान है "रमेश जी कुछ समझ पाते इससे पहले उनके होटल में काम करने वाला माली मोहनलाल हाथ जोड़कर सामने आ खड़ा हुआ।"भैया पहचाना नहीं क्या ?यह मेरा बेटा सूरज जिसकी स्टेशनरी दुकान अपने खुलवाई थी। हम कितने दिनों सेआपको ढूंढ रहे थे। वह तो कल सूरज ने आपको बैंक में देखा और वहीं से आपका पता निकलवाया। आज आपकी वजह से मेरा बेटा शहर का किताबों का सबसे बड़ा व्यापारी बन चुका है। "अच्छा तो कल मैनेजर के कमरे में तुम थे।"रमेश जी की आंखों में गर्व के आंसू थे। उन्होंने सूरज को गले लगाते हुए कहा, "मुझे गर्व है कि तुमने मेरी उम्मीदों से भी अधिक सफलता हासिल कर ली है।कार्यक्रम समाप्त होने के बाद रमेश जी चलने लगे तो सूरज ने उनके हाथों में एक पैकेट थमाया। "बाबूजी मना मत करना यह छोटी सी भेंट है। इसमें मेरे छोटे भाई की फीस के पैसे हैं।" नहीं नहीं यह मैं कैसे ले सकता हूं।"रमेश जी बोल पड़े। बाबूजी यह मैं अपने छोटे भाई के लिए दे रहा हूं। अगर समय पर पर आपने मेरी मदद ना की होती तो आज भी मैं गलियों मे घूम कर अखबार ही बांट रहा होता। आपके दिखाएं आदर्शों पर चल कर ही मैने कुछ लोगों के साथ मिलकर एक ट्रस्ट बनाया है। जो हर साल 5 जरूरतमंद विद्यार्थियों की मदद करता है।जब वह विद्यार्थी अपने जीवन में सफल हो जाते हैं तो वह हमारे ट्रस्ट में योगदान करते हैं। कहते हुए सूरज ने रमेश जी के आगे हाथ जोड़ लिए। रमेश जी चाह कर भी अब उसे मना नहीं कर सके। आज उनके लगाए हुए छोटे पौधे ने विशाल वट वृक्ष का रूप धारण कर लिया था। जिसकी छांव में न जाने कितने नए पौधे वृक्ष बनने की राह पर अग्रसर हो रहे थे।
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