उजाला
कहानी लेखन प्रतियोगिता का प्रथम पुरस्कार जाता है... काव्या शर्मा को। और पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। काव्या ने पुरस्कार ग्रहण किया। काव्या को लिखने का बड़ा शौक था। आज कॉलेज में कहानी लेखन की प्रतियोगिता में उसने प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया था। वह अपना अवार्ड लेकर चहकती हुई घर में आती है। मां कितना खुश होगी यह पुरस्कार देखकर। यह सोचते हुए और घर में प्रवेश करती है लेकिन घर में पसरा सन्नाटा और संजीदा माहौल देखकर वह चुपचाप अपने कमरे में चली गई। उसकी मां मालती देवी डाइनिंग टेबल पर बैठकर सब्जियां काट रही थीं।उनके चेहरे पर फैली नाराजगी देखकर काव्य समझ गई कि आज भाभी को ऑफिस से आने में फिर देर हुआ होगा।
"शर्मा निवास" में मालती देवी अपनी बहू निधि और अपनी बेटी काव्या के साथ रहती थीं। मालती देवी के पति का कुछ साल पहले देहांत हो चुका था, और घर की ज़िम्मेदारी अब उनके बेटे रोहित और बहू निधि ने अच्छे से संभाल ली थी। लेकिन सब कुछ होते हुए भी इस घर में एक खामोशी हमेशा बनी रहती थी। सास-बहू के रिश्ते में एक अनकहा फासला था। निधि एक पढ़ी-लिखी और आत्मनिर्भर महिला थी। शादी के बाद उसने सोचा था कि वह अपनी सास को अपनी माँ की तरह मानकर रिश्ता निभाएगी, लेकिन मालती देवी
हमेशा थोड़ी सख्त और रूढ़िवादी थीं। जबकि निधि नई सोच की।उन्हें निधि का नए जमाने की सोच रखना, अपने काम में व्यस्त रहना और घर के काम में कम रुचि लेना बिल्कुल पसंद नहीं था। दूसरी ओर, निधि को लगता था कि सास उसे कभी समझने की कोशिश ही नहीं करतीं। दिवाली के पहले.."मां जी, दिवाली के लिए कौन-कौन सी मिठाइयां और नाश्ते मंगवाने हैं आप बता दो।मै ले आऊंगी।"मिठाइयां बाहर से क्यों.? सारी मिठाइयां और नाश्ते घर पर बनाएंगे। हम तो अपने जमाने में त्यौहार के कई दिनों पहले मिठाइयां गुजिया मठरी बनाने में लग जाते थे। और ये आजकल की लड़कियां!"
ऐसे ही घर में जब भी कोई त्यौहार या आयोजन होता, सास-बहू के बीच छोटी-छोटी बातों पर तकरार हो जाती। यह देखकर काव्या, जो अब कॉलेज में पढ़ रही थी, उसे यह सब बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। वह अक्सर सोचती कि इनका रिश्ता कैसे सुधर सकता है।एक दिन काव्या ने अपनी माँ और भाभी से बात करने का फैसला किया। वह बोली, "माँ, भाभी। मुझे लगता है कि आप दोनों एक-दूसरे को गलत समझती हैं। भाभी, माँ को लगता है कि आपने उन्हें कभी माँ की तरह अपनाया नहीं, और माँ, भाभी को लगता है कि आप उनकी मेहनत और कोशिशों को नहीं देखतीं। क्यों न आप दोनों एक बार खुलकर बात करें?" मालती देवी ने पहले तो इस बात को टाल दिया, लेकिन कही न कहीं काव्या की बातों में उन्हें में सच्चाई दिखाई दे रही थी।कुछ दिनों बाद एक दिन मालती देवी की तबीयत खराब हो गई। निधि ने तुरंत ऑफिस से छुट्टी ली और पूरे दिन उनकी सेवा में लगी रहीं। चाय से लेकर दवा तक, सब कुछ समय पर दिया। उस दिन मालती देवी को निधि में एक बेटी नजर आ रही थी।"निधि बेटा ,तुमने आज मेरी इतनी सेवा की। मुझे तो लगता था कि तुझे मेरी कोई परवाह ही नहीं लेकिन मैं गलत थी।"आज पहली बार मालती देवी ने निधि से खुलकर अपने दिल की बात कही।निधि मुस्कुराई, "माँ, मैंने हमेशा आपको अपनी माँ की तरह माना, पर शायद मैं आपको यह दिखा नहीं पाई।उस घटना के बाद, मालती देवी और निधि के बीच रिश्ता बदलने लगा। अब दोनों एक-दूसरे को समझने लगी थीं। काव्या ने देखा कि घर का माहौल कितना खुशनुमा हो गया है।एक दिन, जब रोहित ने पूछा, "माँ, आज खाने में क्या बना है?" तो मालती देवी ने हँसते हुए कहा, "आज खाना निधि ने बनाया है। उसने मेरी पसंद की खिचड़ी ,रायता और चटनी बनाई है।" यह सुनकर रोहित मुस्कुरा दिया, क्योंकि उसने अपनी माँ को पहली बार अपनी बहू की तारीफ करते देखा।अब यह घर सिर्फ ईंट और पत्थरों का नहीं था, बल्कि एक ऐसा परिवार बन चुका था जहाँ रिश्तों में प्यार और समझदारी थी। सास-बहू का रिश्ता अब तकरार का नहीं, बल्कि एक माँ-बेटी जैसा हो गया था।काव्या ने अपनी डायरी में लिखा, "जहाँ दिल की बातों को सुना और समझा जाए, वहाँ रिश्तों में नए सवेरे का उजाला जरूर होता है।"
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