संदेश

जून, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अस्तित्व

 सुमन प्रतिदिन की तरह सुबह की पहली किरण के साथ उठ गई थी। घर का हर कोना उसकी दिनचर्या से अच्छी तरह परिचित था — चाय बनाना, बच्चों के टिफिन तैयार करना, पति की शर्ट पर इस्त्री करना, और पूरे घर को सजा-संवार कर खुद को जैसे किसी कोने में रख देना। ठीक वैसे ही जैसे एक आम मध्यमवर्गीय महिला का जीवन होता है। सुबह उठते ही उसकी नजर कैलेंडर पर पड़ी। 26 फरवरी, आज का दिन कुछ अलग था।आज उसका जन्मदिन था।बचपन में जन्मदिन का मतलब होता था नए कपड़े, मिठाइयाँ और ढेर सारी शुभकामनाएँ। लेकिन शादी और मां बनने के बाद, ये दिन भी बस एक आम दिन जैसा ही हो गया था — बिना कोई खास जश्न, बिना कोई खास एहसास। कभी पति और बच्चों को अचानक से याद आ जाए तो ठीक,नहीं तो! आज सुबह भी वही हुआ। किसी ने उसे "हैप्पी बर्थडे" नहीं कहा। ना बच्चों ने, ना उसके पति ने। वो चुपचाप रसोई में लगी रही, पर आज उसकी आंखों में हल्की नमी थी। एक उम्मीद थी जो हर साल दिल के कोने से सिर उठाती थी — कि शायद इस बार कुछ अलग हो। सुमन, पति की आवाज उसके कानों में आई। उसके मन के किसी कोने में एक आस सी जगती है,लगता है इन्हें मेरा बर्थडे याद आ गया। वह से भाग ...

छवि

शहर की चहल-पहल से दूर, एक छोटे से कस्बे में बने हुए घर कमला निवास में आज अलग ही रौनक थी। पूरे घर में सजावट चल रही थी, कहीं फूलों की लड़ियां लगाई जा रही थी तो कहीं रंग-बिरंगे रोशनी वाले बल्बों  की सजावट। मिठाइयों की खुशबू हवाओं में अलग ही घुली थी और हर  चेहरे पर मुस्कान थी। वजह थी — विमल की शादी। विमल दामोदर और कमला जी की चार संतानों में सबसे छोटा था। उसका बड़ा भाई विपिन यहीं रहकर पिताजी के साथ उनके छोटे से लेकिन जमे जमाए व्यापार को आगे बढ़ा रहा था। दोनों बहनों सरिता और नीरा का विवाह हो चुका था। विमल डॉक्टर था और मुंबई में रहकर अपनी प्रैक्टिस करता था। बड़ी बहन सरिता और छोटी बहन नीरा, दोनों भाई की शादी में मायके आई हुई थीं। बरसों बाद पूरा परिवार एक जगह इकट्ठा हुआ था। रिश्तेदारों का आना-जाना लगा था, और इसी बीच अगर  किसी की सबसे ज्यादा पूछ थी , तो वो था — नीरा का पति अमित। अमित की हर जगह खूब खातिरदारी हो रही थी। कोई उन्हें फल-मिठाइयां पूछता, तो कोई उनके लिए कुर्सी आगे करता। खाना परोसा जाता तो सबसे पहले उनकी थाली सजती। घर के पुरुष उन्हें अलग ही सम्मान से बुलाते: "अरे अमित जी, ...

पत्नी का मायका

अर्जुन जैसे हीऑफिस से लौटा और फ्रेश होकर  सोफे पर बैठा ही था कि नीलम उसके लिए चाय नाश्ता लेकर आई और पूछा "क्या हुआ तुमने अपने ऑफिस में बात की?"किस बारे में? उसने रूखा सा जवाब दिया। नीलम हैरानी से उसकी ओर  देखती है  "हमें कल लखनऊ के लिए नहीं निकलना है?"लेकिन अर्जुन उदासीन स्वर में जवाब देते हुए कहता कि तुम चली जाओ । अभी तो मुझे थोड़ी मुश्किल हो जाएगी पीछे से देखता हूं। वह कहती कुछ नहीं लेकिन उसके चेहरे पर उदासी साफ झलक उठती है। नीलम और अर्जुन की शादी को सात साल हो चुके थे। नीलम, एक समझदार और व्यवहार-कुशल स्त्री थी, जिसने शादी के बाद अपने ससुराल को पूरी लगन और प्यार से अपनाया था। सास-ससुर की सेवा से लेकर घर की जिम्मेदारियों तक, नीलम ने कभी कोई कसर नहीं छोड़ी थी। त्योहारों में मिठाइयाँ बनाना हो या रिश्तेदारों की मेहमानदारी, वह हमेशा सबसे आगे रहती।अर्जुन, एक सरकारी कर्मचारी, थोड़े शांत स्वभाव का था लेकिन कहीं न कहीं अपने अंदर एक संकुचित सोच पाले बैठा था। उसे ससुराल यानी नीलम के मायके से ज्यादा लगाव नहीं था। उसे लगता था कि ससुराल में पत्नी का योगदान जरूरी है, लेकिन मायके...

हार

आशा शर्मा, एक नव-नियुक्त सरकारी शिक्षिका, कुछ महीनों पहले ही उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव भैरवपुर के उच्च प्राथमिक विद्यालय में अध्यापन के लिए आई थी। शहर की चकाचौंध छोड़कर गाँव के धूल-भरे रास्ते, टूटी-फूटी इमारतें और सीमित संसाधनों के बीच उसने एक नया जीवन शुरू किया था।वो अपने काम के प्रति बेहद समर्पित थी। बच्चों को पढ़ाना उसके लिए सिर्फ नौकरी नहीं, एक मिशन था — उन्हें एक बेहतर भविष्य देना, उन्हें सपनों की उड़ान देना। कुछ ही समय में वह बच्चों के बीच भी काफी लोकप्रिय हो गई थी।एक दिन, जब वह रोज़ की तरह स्कूल पहुंची, उसने देखा कि स्कूल के सामने वाले कुछ घरों में जहां कुछ गरीब परिवार रहते थे, काफी हलचल है। महिलाएं रंग-बिरंगे कपड़े पहने सज रही थीं, औरतें गीत गा रही थीं, आंगन में पंडाल सज रहे थे।जिज्ञासावश उसने एक छात्रा से पूछा, “यहाँ क्या हो रहा है?”छात्रा बोली, “मैडम, गुड़िया की शादी हो रही है।”गुड़िया?” आशा चौंक गई, “कौन गुड़िया?”“वही गुड़िया मैडम, जो सातवीं में पढ़ती है…अरे मैडम स्कूल के रजिस्टर में उसका नाम नंदिनी है।” आशा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “गुड़िया की शादी? वो तो केवल 13 स...