अस्तित्व
सुमन प्रतिदिन की तरह सुबह की पहली किरण के साथ उठ गई थी। घर का हर कोना उसकी दिनचर्या से अच्छी तरह परिचित था — चाय बनाना, बच्चों के टिफिन तैयार करना, पति की शर्ट पर इस्त्री करना, और पूरे घर को सजा-संवार कर खुद को जैसे किसी कोने में रख देना। ठीक वैसे ही जैसे एक आम मध्यमवर्गीय महिला का जीवन होता है। सुबह उठते ही उसकी नजर कैलेंडर पर पड़ी। 26 फरवरी, आज का दिन कुछ अलग था।आज उसका जन्मदिन था।बचपन में जन्मदिन का मतलब होता था नए कपड़े, मिठाइयाँ और ढेर सारी शुभकामनाएँ। लेकिन शादी और मां बनने के बाद, ये दिन भी बस एक आम दिन जैसा ही हो गया था — बिना कोई खास जश्न, बिना कोई खास एहसास। कभी पति और बच्चों को अचानक से याद आ जाए तो ठीक,नहीं तो!
आज सुबह भी वही हुआ।
किसी ने उसे "हैप्पी बर्थडे" नहीं कहा।
ना बच्चों ने, ना उसके पति ने।
वो चुपचाप रसोई में लगी रही, पर आज उसकी आंखों में हल्की नमी थी। एक उम्मीद थी जो हर साल दिल के कोने से सिर उठाती थी — कि शायद इस बार कुछ अलग हो। सुमन, पति की आवाज उसके कानों में आई। उसके मन के किसी कोने में एक आस सी जगती है,लगता है इन्हें मेरा बर्थडे याद आ गया। वह से भाग कर कमरे में जाती है। "अरे यार.मेरा रुमाल नहीं मिल रहा, कितनी बार कहा है कि कपड़ों के साथ ही निकाल कर रख दिया करो"उसने कोई जवाब नहीं दिया केवल रूमाल निकाल कर रख दिया। वह वापस रसोई में चली गई। "मम्मी"रसोई घर की तरफ बढ़ती हुई बेटी की आवाज उसके कानों से टकराई। क्या इसे मेरा..? लेकिन वह अपनी ही सोच पर झेंप जाती है.. मैं भी क्या बच्चों की तरह। "अरे मम्मी मेरा लंचबॉक्स पैक कर दिया क्या? मैं वह कह रही थी की दो परांठे ज्यादा ही रख देना। रिया की मम्मी शहर से बाहर गई है ,तो उसके लिए भी।"ठीक है बेटा"
जब सब अपने-अपने काम पर निकलने लगे, उसने हल्के से कहा,"शाम को ज़रा जल्दी आ जाना... सोचा है सबके साथ कहीं घूम आएंगे।"बच्चे बोले, "मम्मी, प्रोजेक्ट है कॉलेज का।"पति ने कहा, "ऑफिस में मीटिंग्स हैं। देखता हूं कोशिश करूंगा।"
दरवाज़ा बंद हुआ तो घर में फिर वही सन्नाटा छा गया। तभी उसकी बचपन की सहेली रीमा उसे बर्थडे विश करने के लिए फोन करती है।"हैप्पी बर्थडे सुमन, और बता ,आज के क्या प्लांस है?"लेकिन सुमन की खामोशी से वह अंदाजा लगा लेती है। इस बार भी तेरे पति और बच्चों को तेरा बर्थडे याद नहीं रहा होगा। अरे यार तूने तो खुद को घर परिवार के बीच कहीं खो सा दिया है । जब तक तू खुद अपना ख्याल रखना नहीं सीखेगी तब तक कोई तेरे बारे में नहीं सोचेगा।" रीमा की बातों को सुनकर इस बार सुमन ने भी तय कर लिया —
"अब और नहीं।"
आज वो किसी का इंतजार नहीं करेगी।
आज वो खुद के लिए जिएगी।
वो अलमारी की तरफ गई, वो साड़ी निकाली जो उसे बेहद पसंद थी, लेकिन कभी खुद के लिए पहनी ही नहीं। हल्का मेकअप किया, बाल संवारें, और खुद को आइने में देखकर मुस्कुरा दी —
"तू अब भी खूबसूरत है, सुमन।"
फिर वो अकेले मॉल चली गई।
शॉपिंग की, जाने कितने दिनों के बाद बिना बजट का सोचे कुछ अपनी पसंद की चीजें खरीदीं।
कॉफी शॉप में बैठी, अकेले एक छोटा सा चॉकलेट केक मंगाया और खुद से बोली,
"हैप्पी बर्थडे, सुमन!"
हर पल में उसे एक नई आज़ादी महसूस हो रही थी।
कई सालों बाद वो हँसी थी — खुलकर, बेझिझक।
शाम को जब पति और बच्चे घर लौटे, तो दरवाज़ा बंद मिला।घर में वो नहीं थी, जो हमेशा सबसे पहले दरवाज़ा खोलती थी।"यह मम्मी कहां चली गई? जोरों की भूख लग रही है। आपको कुछ पता है पापा।"नहीं मुझे भी कुछ नहीं बताया। मैं तो खुद हैरान हूं। कि ऐसे कैसे बिना किसी को बताए कहां चली गई?"पति ने इधर-उधर कॉल किए, पड़ोसियों से पूछा — और तभी मोबाइल में एक फोटो दिखी:सुमन मॉल के कैफे में बैठी थी, केक काटते हुए।
तब जाकर बच्चों को याद आया, कि अरे,
"मम्मी का आज बर्थडे है!"इसलिए वह शाम को हम सबको जल्दी आने को बोल रही थीं।
और फिर एक अपराधबोध से सबका चेहरा उतर गया। थोड़ी देर में सुमन पति और बच्चे भी मॉल पहुंच चुके थे।
जब वे मॉल पहुंचे, सुमन अब भी वहीं बैठी थी। अकेली, लेकिन पूरी।
उसे देखकर पति ने धीरे से कहा,
"सुमन... सॉरी। हम सब भूल गए।"
सुमन ने मुस्कुराते हुए कहा,
"कोई बात नहीं। इस बार मुझे खुद को याद था।"
बच्चों ने भी उसे गले लगाया,
"हैप्पी बर्थडे, मम्मी!"लेकिन आपने तो हमें डरा ही दिया था।थोड़ी देर पूरा परिवार रेस्टोरेंट में बैठकर एक साथ खाना खा रहा था। आज बच्चों ने सब कुछ मां की पसंद का आर्डर किया था।उस दिन के बाद सब कुछ बदल गया। क्योंकि सुमन ने निश्चय कर लिया था कि अब वह खुद को खोने नहीं देगी। अब वो सिर्फ मां और पत्नी नहीं थी,
वो सुमन भी थी — एक औरत, एक इंसान, जिसकी अपनी पहचान है ।
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