हार
आशा शर्मा, एक नव-नियुक्त सरकारी शिक्षिका, कुछ महीनों पहले ही उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव भैरवपुर के उच्च प्राथमिक विद्यालय में अध्यापन के लिए आई थी। शहर की चकाचौंध छोड़कर गाँव के धूल-भरे रास्ते, टूटी-फूटी इमारतें और सीमित संसाधनों के बीच उसने एक नया जीवन शुरू किया था।वो अपने काम के प्रति बेहद समर्पित थी। बच्चों को पढ़ाना उसके लिए सिर्फ नौकरी नहीं, एक मिशन था — उन्हें एक बेहतर भविष्य देना, उन्हें सपनों की उड़ान देना। कुछ ही समय में वह बच्चों के बीच भी काफी लोकप्रिय हो गई थी।एक दिन, जब वह रोज़ की तरह स्कूल पहुंची, उसने देखा कि स्कूल के सामने वाले कुछ घरों में जहां कुछ गरीब परिवार रहते थे, काफी हलचल है। महिलाएं रंग-बिरंगे कपड़े पहने सज रही थीं, औरतें गीत गा रही थीं, आंगन में पंडाल सज रहे थे।जिज्ञासावश उसने एक छात्रा से पूछा, “यहाँ क्या हो रहा है?”छात्रा बोली, “मैडम, गुड़िया की शादी हो रही है।”गुड़िया?” आशा चौंक गई, “कौन गुड़िया?”“वही गुड़िया मैडम, जो सातवीं में पढ़ती है…अरे मैडम स्कूल के रजिस्टर में उसका नाम नंदिनी है।”
आशा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “गुड़िया की शादी? वो तो केवल 13 साल की है!” नंदिनी उर्फ़ गुड़िया पढ़ने लिखने में भी काफी होशियार और मेहनती लड़की थी।
आशा भागी-भागी गुड़िया के घरवालों से मिलने पहुंची। उसने गुड़िया की मां से पूछा, “आप गुड़िया की शादी कर रहे हैं?”
गुड़िया की मां बोली, “हां, मैडम जी,लड़की सयानी हो गई है। अब और क्या करना है? अच्छा घर है, लड़का पैसेवाला है, हमारी लड़की का भाग्य खुल जाएगा।”
“पर वो तो बच्ची है,” आशा ने विरोध किया, “उसे खेलने, पढ़ने का हक़ है। बाल विवाह कानूनन अपराध है।”
गुड़िया का पिता बीच में बोल पड़ा, “मैडम जी, आप शहर से आई हैं, हमारे रीति-रिवाज नहीं जानतीं। यहां ऐसे ही होता है।हम अपनी बेटी का भला-बुरा अच्छे से समझते है। तभी आशा की नजर अंदर कमरे में पीली साड़ी में बैठी गुड़िया पर पड़ती है। जो मैडम को देखकर मुस्कुराते हुए इशारे से अपने मेहंदी लगे हुए हाथों को दिखा रही थी। उसकी भोली सी मुस्कान देखकर वह निराश होकर विद्यालय में लौट आती हैं।
आशा ने विद्यालय के अन्य शिक्षकों से बात की, लेकिन उन्हें भी यह सब ‘परंपरा’ ही लगती थी।
आशा ने पुलिस में कंप्लेंट दर्ज कराने का भी सोचा, लेकिन, आप नए हैं मैडम,” एक वरिष्ठ शिक्षक बोले, “यहाँ लोग बात पैसे से दबा देते हैं। आप बेकार में दुश्मनी मत मोल लीजिए।”गाँव में पुलिस अक्सर पैसों और राजनीतिक दबाव के आगे झुक जाती थी। फिर भी, उसने जिला कार्यालय में चाइल्ड वेलफेयर ऑफिसर को मेल भेजा, लेकिन उसे कोई उत्तर नहीं मिला।
खैर गुड़िया की शादी हो गई। अगले दिन स्कूल में काम करने वाली महिलाओं से पता चला की लड़के वाले काफी अच्छी बारात ले आए थे। गहने कपड़े सभी कुछ ठीक था। लेकिन लड़का दुगनी से भी ज्यादा उम्र का था।"और मैडम हमने तो सुना है की लड़के की यह दूसरी शादी है ।उसकी पहली पत्नी को मरे हुए 2 साल हो चुके हैं। तभी तो उन्होंने गरीब परिवार की लड़की उठा ली, चलो लड़की का भी भला हुआ। वरना उसकी मां-बाप भी कहां दहेज जोड़ पाते?"यह सब सुनकर आशा का मन दुख और ग्लानि से भर गया।
कुछ दिन बाद गुड़िया स्कूल आई — भारी साड़ी, गहनों से लदी हुई, सिर झुकाए शर्माई हुई, लेकिन उसकी आंखों में खुशी थी — एक नासमझ सी खुशी।“मैडम देखो, मुझे सोने के झुमके मिले! और मेरी सास बहुत अच्छी है, हर रोज़ मुझे दूध देती है। और खाने के लिए अच्छी-अच्छीमठाइयां।"
आशा उसे देखती रही। उसकी मुस्कुराहट के पीछे एक अनदेखा दर्द था, एक ऐसा भविष्य जो शायद अब कभी नहीं बदल पाएगा।"देखिए आशा मैडम ,गुड़िया कितनी खुश नजर आ रही है। आप नाहक ही इतना परेशान हो रही थी। रात में काम करने वाली दूसरी महिला शिक्षिका की बात सुनकर आशा मैडम सोचने लगी।"गुड़िया तो खुश है — क्योंकि उसे यह नहीं पता कि उसका क्या छीना गया है। न किताबों का अधिकार, न सपनों का रास्ता।
क्या मेरी हार हुई? या फिर समाज ?
यह कहानी सिर्फ गुड़िया की नहीं, भारत के हजारों गांवों की है, जहां आज भी बाल विवाह एक कड़वी सच्चाई है। बदलाव की शुरुआत एक आवाज़ से होती है — और आशा जैसी शिक्षिकाएं उस आवाज़ की पहली गूंज हैं।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें