पत्नी का मायका
अर्जुन जैसे हीऑफिस से लौटा और फ्रेश होकर सोफे पर बैठा ही था कि नीलम उसके लिए चाय नाश्ता लेकर आई और पूछा "क्या हुआ तुमने अपने ऑफिस में बात की?"किस बारे में? उसने रूखा सा जवाब दिया। नीलम हैरानी से उसकी ओर देखती है "हमें कल लखनऊ के लिए नहीं निकलना है?"लेकिन अर्जुन उदासीन स्वर में जवाब देते हुए कहता कि तुम चली जाओ । अभी तो मुझे थोड़ी मुश्किल हो जाएगी पीछे से देखता हूं। वह कहती कुछ नहीं लेकिन उसके चेहरे पर उदासी साफ झलक उठती है।
नीलम और अर्जुन की शादी को सात साल हो चुके थे। नीलम, एक समझदार और व्यवहार-कुशल स्त्री थी, जिसने शादी के बाद अपने ससुराल को पूरी लगन और प्यार से अपनाया था। सास-ससुर की सेवा से लेकर घर की जिम्मेदारियों तक, नीलम ने कभी कोई कसर नहीं छोड़ी थी। त्योहारों में मिठाइयाँ बनाना हो या रिश्तेदारों की मेहमानदारी, वह हमेशा सबसे आगे रहती।अर्जुन, एक सरकारी कर्मचारी, थोड़े शांत स्वभाव का था लेकिन कहीं न कहीं अपने अंदर एक संकुचित सोच पाले बैठा था। उसे ससुराल यानी नीलम के मायके से ज्यादा लगाव नहीं था। उसे लगता था कि ससुराल में पत्नी का योगदान जरूरी है, लेकिन मायके में पति का क्या काम? जब भी नीलम उसे मायके किसी फंक्शन या ज़रूरत के समय चलने को कहती, अर्जुन कोई न कोई बहाना बना देता — "ऑफिस का काम है", "थोड़ा थका हूँ", या "इतने खर्च में क्या रखा है? तुम अकेली ही चली जाओ।"पर इस बार बात कुछ और थी। नीलम के छोटे भाई रोहित की शादी थी। घर में उत्सव का माहौल था, माँ-बाप बूढ़े हो चले थे, ऐसे में नीलम चाहती थी कि अर्जुन भी साथ चले, मायके वालों की थोड़ी मदद करे, और उस घर को भी अपनेपन का अहसास दिलाए। लेकिन अर्जुन फिर टालमटोल करने लगा।“नीलम, तुम चली जाओ। मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही। और फिर तुम्हारे घर में वैसे भी सब हैं, मेरी ज़रूरत नहीं होगी,” अर्जुन ने फिर एक बहाना बनाया।नीलम शांत रही, उसने कुछ नहीं कहा। लेकिन उसके चेहरे पर उदासी साफ झलक रही थी। उसने धीरे से पूछा, “अर्जुन, एक बात बताओ, अगर तुम्हारे छोटे भाई की शादी होती और मैं मना करती चलने से, तो तुम्हें कैसा लगता?”अर्जुन थोड़ा झिझका, “वो बात अलग है, तुम ऐसा सोच भी कैसे सकती हो नीलम? तुम तो घर की बहू हो, तुम्हें आना ही होता है।"
नीलम कहा कुछ नहीं,मुस्कराई, लेकिन उसकी मुस्कान में एक कसक थी। “तो क्या मैं सिर्फ इस घर की बहू हूँ? क्या मैं बेटी नहीं? और क्या तुम सिर्फ इस घर के दामाद हो, कोई रिश्तेदार नहीं? अर्जुन, मैंने कभी तुम्हारे घर को 'तुम्हारा घर' नहीं कहा, हमेशा ‘हमारा’ ही कहा। लेकिन शायद तुम आज भी मेरे घर को 'मेरा घर' समझते हो, 'हमारा' नहीं।”अर्जुन चुप हो गया। उसने नीलम की आँखों में देखा — वहाँ शिकायत नहीं थी, सिर्फ उम्मीद थी।उस रात नीलम ने अर्जुन को अपने मायके के कुछ पुराने फ़ोटो दिखाए — रोहित के बचपन के, माँ-पापा की मेहनत के, और उस घर की दीवारों में छिपे संघर्षों की कहानियाँ। उसने बताया कैसे उसकी माँ ने सिलाई करके बच्चों को पढ़ाया, कैसे रोहित ने पढ़ाई के साथ-साथ पार्ट टाइम नौकरी की। नीलम की आँखों में गर्व और प्रेम दोनों थे।“मैंने कभी तुमसे ज्यादा कुछ नहीं माँगा, अर्जुन,” उसने कहा। “सिर्फ इतना चाहती हूँ कि तुम मेरे अपनेपन को समझो। मैं तुम्हारे घर को अपना मान सकी, तो क्या तुम भी मेरे घर को थोड़ा अपना नहीं मान सकते?”अर्जुन को लगा जैसे किसी ने उसके दिल के बंद दरवाज़े पर दस्तक दी हो। उस रात उसने बहुत देर तक सोचा। याद आया कैसे नीलम ने उसके पिता के बीमार पड़ने पर रात-रात भर सेवा की थी, कैसे वह हर त्योहार पर सास-ससुर की ख्वाहिशों का मान रखकर कहकर उन्हें खुश रखती थी। उसे महसूस हुआ कि वह अब तक सिर्फ लेने का काम कर रहा था, देने का नहीं।
अगली सुबह, नीलम जब अपना सूटकेस तैयार कर रही थी, अर्जुन ने आकर उसका हाथ पकड़ लिया।"तैयार हो जाओ नीलम, और मेरे कपड़े भी पैक कर लो।" उसने मुस्कराकर कहा, "चलते हैं रोहित की शादी में। वैसे भी दूल्हे के जीजा के बिना बारात अधूरी लगती है।"नीलम की आँखों में चमक आ गई। वो कुछ कह नहीं पाई, बस चुपचाप उसकी आँखों से बहता सम्मान अर्जुन के मन को और कोमल कर गया।शादी में अर्जुन ने न सिर्फ भाग लिया, बल्कि पूरे दिल से रिश्तेदारी निभाई। उसने रोहित को अपने हाथों से सेहरा पहनाया, नीलम के माँ पिताजी से खुले दिल से मिला, और शादी के हर काम में बढ़चढ़कर भाग लिया।लौटते समय नीलम ने धीरे से कहा, “धन्यवाद अर्जुन, आज तुमने मेरे मायके को सिर्फ मेरा नहीं, अपना भी बना लिया।”अर्जुन ने हँसते हुए कहा, “नहीं नीलम, आज तुमने मुझे इंसान बना दिया — जो रिश्तों को सिर्फ नामों से नहीं, अपनत्व से पहचानता है।रिश्ते सिर्फ निभाने के लिए नहीं होते, उन्हें जीने की ज़रूरत होती है। जब हम अपने जीवनसाथी के परिवार को भी अपना मान लेते हैं, तभी एक सच्चा रिश्ता बनता है — जिसमें अधिकार नहीं, समझदारी और सम्मान होता है।
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