छवि
शहर की चहल-पहल से दूर, एक छोटे से कस्बे में बने हुए घर कमला निवास में आज अलग ही रौनक थी। पूरे घर में सजावट चल रही थी, कहीं फूलों की लड़ियां लगाई जा रही थी तो कहीं रंग-बिरंगे रोशनी वाले बल्बों की सजावट। मिठाइयों की खुशबू हवाओं में अलग ही घुली थी और हर
चेहरे पर मुस्कान थी। वजह थी — विमल की शादी। विमल दामोदर और कमला जी की चार संतानों में सबसे छोटा था। उसका बड़ा भाई विपिन यहीं रहकर पिताजी के साथ उनके छोटे से लेकिन जमे जमाए व्यापार को आगे बढ़ा रहा था। दोनों बहनों सरिता और नीरा का विवाह हो चुका था। विमल डॉक्टर था और मुंबई में रहकर अपनी प्रैक्टिस करता था। बड़ी बहन सरिता और छोटी बहन नीरा, दोनों भाई की शादी में मायके आई हुई थीं। बरसों बाद पूरा परिवार एक जगह इकट्ठा हुआ था। रिश्तेदारों का आना-जाना लगा था, और इसी बीच अगर किसी की सबसे ज्यादा पूछ थी , तो वो था — नीरा का पति अमित।
अमित की हर जगह खूब खातिरदारी हो रही थी। कोई उन्हें फल-मिठाइयां पूछता, तो कोई उनके लिए कुर्सी आगे करता। खाना परोसा जाता तो सबसे पहले उनकी थाली सजती। घर के पुरुष उन्हें अलग ही सम्मान से बुलाते: "अरे अमित जी, इधर आइए, आपकी राय चाहिए...तो कहीं"अरे जीजा जी मेरे साथ बाजार चलिए न, सुना है आपकी पसंद बड़ी अच्छी है।मैं शादी में पहनने के लिए आपकी पसंद के कपड़े घड़ी खरीदूंगा।"लेकिन इन सबसे दूर, सरिता का पति अशोक एक कोने में चुपचाप बैठा था। चाय नाश्ता तो उसे भी पूछा ही जा रहा था लेकिन कोई खास तवज्जो, न कोई आत्मीयता। यही बात सरिता को भीतर ही भीतर खलने लगी। जब नीरा के पति को सब इतना पूछ रहे हैं, तो उसके पति की उपेक्षा क्यों? जबकी वह तो घर का बड़ा दामाद है।शाम को जब मेहमान कम हुए और घर थोड़ा शांत हुआ, सरिता नीरा के पास जा बैठी। आवाज़ में कसक थी।
"तुमने देखा, नीरा? सब अमित की कितनी इज्जत कर रहे हैं। और अशोक को कोई पूछ तक नहीं रहा। जबकि दोनों ही इस घर के दामाद हैं । मेरा मायका है, फिर भी यहाँ अपने ही पति को इतना नजरअंदाज़ होते देखना... अच्छा नहीं लगता।"नीरा ने सरिता की तरफ देखा, मुस्कुराई, फिर थोड़ा गंभीर होकर बोली,
"दीदी, यह सब आपका ही किया धरा है। यही तो आपने सालों पहले बोया था, अब वही फल मिल रहा है।"सरिता चौंकी, "क्या मतलब?""याद है दीदी, जब अशोक जीजा जी का बिजनेस अच्छा नहीं चल रहा था? तब आप दोनों में लड़ाइयाँ होती थीं, तो आप मायके आकर कितना कुछ कहती थीं उनके बारे में? आंख भर भर कर सबसे उनकी बुराइयां करती थी।मम्मी-पापा से, भाभी से, मुझसे — सबको आपने यही बताया कि जीजा जी ज़िम्मेदार नहीं हैं, गुस्से वाले हैं, परिवार की कद्र नहीं करते।""अब भले ही सब ठीक है आप दोनों में, प्यार है, सम्मान है। लेकिन घरवालों के मन में तो वो बातें बस गईं न, जो आपने खुद कही थीं। कोई जानता नहीं था जीजा जी को, जैसा आपने बताया, वैसा ही मान लिया सबने।"सरिता की आँखें झुक गईं। उसकी आंखों में आंसू आ गए। नीरा ने धीरे से उसका हाथ थामा।
"एक बात कहूं दीदी? हर किसी के जीवन में उतार-चढ़ाव आते हैं। मेरे अमित की भी नौकरी एक बार छूट गई थी। बहुत बुरा दौर था वो। लेकिन मैंने कभी भी मायके आकर उनका बुरा नहीं कहा। उल्टा जो कमज़ोरियां थीं, उन्हें प्यार से समझाया, उनके साथ खड़ी रही। इसीलिए आज जब वो सफल हैं, तो घरवाले भी उन्हें सम्मान से देखते हैं — क्योंकि मैंने कभी उनकी छवि बिगड़ने नहीं दी।"सरिता की आंखों से अब आंसू बहने लगे थे। वो कुछ बोल नहीं पाई।नीरा ने बात जारी रखी,"माना कि,मायके हमारा सहारा होते हैं, लेकिन वो हमारे रिश्तों का आईना भी बन जाते हैं। जो हम बताते हैं, वही वो मान लेते हैं। अच्छा बुरा समय और उतार-चढ़ाव हर रिश्ते में आता है लेकिन जब हम यहां अपने जीवनसाथी की बुराई करते हैं, तो उनके मन में सम्मान नहीं, शंका पैदा होती है — जो सालों बाद भी मिटती नहीं।"सरिता अब फूट-फूटकर रोने लगी।"मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई, नीरा... मैं तो बस दुख बांटने आई थी, पर यह नहीं सोचा कि मैंने अपने ही पति की छवि को मायके में हमेशा के लिए बिगाड़ दिया।"नीरा ने उसे गले से लगाया।"दीदी अब पछताने से अच्छा है, आगे से ऐसा न हो। घरवालों को समय दो, और खुद भी अपने रिश्ते को फिर से सबके सामने उसी गरिमा से पेश करो। शायद धीरे-धीरे सब ठीक हो जाए।"
रिश्तों की इज्जत केवल बाहर नहीं, अपनों के बीच भी बनानी पड़ती है। वक़्त चाहे जैसा हो, अगर हम अपनों की छवि खुद ही बिगाड़ेंगे, तो समाज से सम्मान की उम्मीद करना व्यर्थ है।
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