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मई, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

प्रेरणा

 शाम का समय था। आसमान पर ढलती हुई धूप सुनहरी चादर ओढ़े हुए थी। नेहा,जो कि एक मल्टीनेशनल कंपनी में इंजीनियर थी और छुट्टियों में बेंगलुरु से अपने गांव आई हुई थी ।वह मअपने ता-पिता के साथ घर के आंगन में बैठी थी। हल्की-हल्की ठंडी हवा चल रही थी, और माँ ने गरमा-गरम अदरक वाली चाय और पकौड़े बना दिए थे। नेहा की हँसी पूरे आंगन में गूंज रही थी, जब वह अपने ऑफिस के मज़ेदार किस्से सुना रही थी। उसके पापा भी मुस्कुरा रहे थे, और माँ बीच-बीच में टोककर हँसी में शामिल हो रही थीं। इसी खुशनुमा माहौल में नेहा की बड़ी ताई जी, यानी पिताजी की भाभी, अचानक दरवाजे पर आ पहुँचीं। उनके चेहरे पर गर्व की मुस्कान थी और आँखों में चमक। "अरे वाह ताई जी! आइए-आइए, बैठिए," नेहा ने कहा और ताई जी के लिए कुर्सी खींच दी। ताई जी ने बैठते ही कहना शुरू किया, " अरे नेहा बिटिया तू कब आई ? वैसे मैं भी तो यहाँ नहीं थी।मायके गई थी।तुम लोगों को पता है, हमारे मायके में मेरी भतीजी की शादी हुई है... डॉक्टर है वो! और क्या शान से हुई है शादी! लड़के वाले तो  बड़ी पार्टी हैं, लड़का बड़ा सरकारी अधिकारी है।और हमारे भाई साहब ने भी कोई...

सफलता

बिजनेस वूमेन ऑफ द ईयर , अवनी मेहरा। और पूरा हॉल तालियों  की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। अवनी ने पुरस्कार ग्रहण किया। बाद में पत्रकारों के ढेर सारे सवाल और लोगों की बधाइयां। आज अवनी का एक बड़ा सपना पूरा हुआ था। पर जब वह पुरस्कार लेने मंच पर खड़ी थी, नीचे तालियाँ बज रही थीं—लेकिन उसकी सफलता का गवाह बनने के लिए उसके अपनों में कोई भी वहां नहीं था।उस रात अवनी अपने सी-फेसिंग पेंटहाउस में अकेली बैठी थी। हाथ में वाइन का गिलास था, पास में पुरस्कार—लेकिन मन में एक सूनापन। अवनी मेहरा एक छोटे शहर, इंदौर की मध्यमवर्गीय लड़की थी। पढ़ाई में अव्वल, स्वप्न बड़े। उसके पिता एक बैंक क्लर्क थे और मां गृहिणी। अवनी के सपनों में हमेशा कुछ बड़ा करने की इच्छा थी—कुछ ऐसा जिससे लोग उसका नाम याद रखें।इंजीनियरिंग के बाद उसने एमबीए किया  फिर एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी मिल गई। वहीं उसकी मुलाकात रोहित से हुई—एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर। दोनों ने परिवार की रजामंदी से प्रेम विवाह किया और मुंबई में बस गए। दोनों एक ही ऑफिस में काम करते थे। लेकिन अवनी इससे संतुष्ट नहीं थी।अवनी ने नौकरी के साथ-साथ एक बिज़नेस आइडिया पर काम ...

बदलाव

 "भाभी! भैया! मेरा प्रमोशन हो गया है और सैलरी भी बढ़ गई है!" मीना और राजीव की आंखों में खुशी के आंसू छलक उठते हैं। "बेटा, आज हमें सच में लग रहा है कि हमारी मेहनत सफल हुई है। अब हमारे सिर पर से चिंता का बोझ हट गया है। तूने हमारी लाज रख ली।"वैसे तो मीना और राजीव राकेश की भाई भाभी थे। लेकिन वह उसे अपना बेटा ही समझते थे। मुंबई के एक पुराने इलाके में राजीव और उसकी पत्नी मीना एक छोटे से फ्लैट में रहते थे।  राजीव का छोटा भाई राकेश, जो उनके माता-पिता के देहांत के समय सिर्फ पाँच साल का था, उन्हें ही माँ-बाप मानकर बड़ा हुआ था। मीना ने अपने बच्चे न होने के बावजूद राकेश को अपने बेटे की तरह पाला।मीना ऑफिस जाने के समय कहती:"राकेश बेटा, खाना खा लेना, अगर मैं थोड़ा लेट हो जाऊंगी तो कहीं इधर-उधर नहीं GGजाना । घर में बैठकर ध्यान से पढ़ाई करना।" और राकेश हमेशा मुस्कुराकर जवाब देता: "हाँ भाभी, आप चिंता मत करो। मैं खूब मन लगाकर पढ़ूंगा ।"राजीव  टैक्सी चलाते थे और बड़ी मुश्किल से घर चलाते थे, मीना भी उनकी मदद के लिए एक छोटे से प्राइवेट ऑफिस में काम करती थी।किन उन्होंन...