सफलता

बिजनेस वूमेन ऑफ द ईयर , अवनी मेहरा। और पूरा हॉल तालियों  की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। अवनी ने पुरस्कार ग्रहण किया। बाद में पत्रकारों के ढेर सारे सवाल और लोगों की बधाइयां। आज अवनी का एक बड़ा सपना पूरा हुआ था।

पर जब वह पुरस्कार लेने मंच पर खड़ी थी, नीचे तालियाँ बज रही थीं—लेकिन उसकी सफलता का गवाह बनने के लिए उसके अपनों में कोई भी वहां नहीं था।उस रात अवनी अपने सी-फेसिंग पेंटहाउस में अकेली बैठी थी। हाथ में वाइन का गिलास था, पास में पुरस्कार—लेकिन मन में एक सूनापन।

अवनी मेहरा एक छोटे शहर, इंदौर की मध्यमवर्गीय लड़की थी। पढ़ाई में अव्वल, स्वप्न बड़े। उसके पिता एक बैंक क्लर्क थे और मां गृहिणी। अवनी के सपनों में हमेशा कुछ बड़ा करने की इच्छा थी—कुछ ऐसा जिससे लोग उसका नाम याद रखें।इंजीनियरिंग के बाद उसने एमबीए किया  फिर एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी मिल गई। वहीं उसकी मुलाकात रोहित से हुई—एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर। दोनों ने परिवार की रजामंदी से प्रेम विवाह किया और मुंबई में बस गए। दोनों एक ही ऑफिस में काम करते थे। लेकिन अवनी इससे संतुष्ट नहीं थी।अवनी ने नौकरी के साथ-साथ एक बिज़नेस आइडिया पर काम करना शुरू किया—महिलाओं के लिए एक खास सस्टेनेबल फैशन ब्रांड।

शुरुआत में न निवेश था, न सहयोग। उसने अपने गहने गिरवी रखकर पहली वेबसाइट बनवाई, सोशल मीडिया पर खुद प्रमोशन किया।बैंक से लोन लिया। रोहित ने भी शुरू में उसका साथ दिया, लेकिन जैसे-जैसे अवनी आगे बढ़ने लगी  समय के साथ उसे लगा कि अवनी की प्राथमिकताएं बदल रही हैं। इसी बीच वह एक बेटे की मां भी बन चुकी थी। उनका बेटा भी अब बड़ा हो रहा था। उसकी देखभाल की जिम्मेदारी उसकी दादी ने संभाल रखी थी।अवनी अब हर वक्त अपने स्टार्टअप में डूबी रहती। बेटे आरव के स्कूल फंक्शन हो, सासू माँ का डॉक्टर से अप्वाइंटमेंट या , पति के प्रमोशन की पार्टी उसके पास किसी चीज के लिए भी समय नहीं था। अपने खुद के माता-पिता से भी जिनकी वह इकलौती संतान थी बात किए हुए महीनो बीत जाते थे।धीरे-धीरे, अवनी का बिज़नेस सफल होने लगा। कुछ ही सालों में वह एक जानी-मानी उद्यमी बन गई। उसके ब्रांड के स्टोर दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर और दुबई तक खुल गए। अवनी जाने-माने उद्योगपतियों  में भी शामिल हो गई। लेकिन आज जब सफलता के शिखर पर थी तब उसका निजी जीवन शून्य हो चला था। क्योंकि उसकापति रोहित अब अलग हो चुका था। बेटे आरव की कस्टडी रोहित के पास थी क्योंकि अवनी के पास "समय" नहीं था। अवनी के मां-पिता भी रिटायरमेंट के बाद अब गाँव लौट चुके  थे।"क्या मैंने जो पाया, वो सच में जीत थी? या जो खोया, वो हार से भी बड़ी कीमत थी?""सफलता का मतलब अगर अपनों की दूरी है, तो फिर शायद मैं इसे सफलता नहीं कहूँगी।"वह अकेली बैठी ही बड़बड़ा रही थी।

कुछ महीनों बाद, अवनी ने अपने काम की रफ्तार थोड़ी धीमी की। एक "Women Balance Retreat" शुरू किया, जहां महिलाओं को ये सिखाया जाता है कि कैसे जीवन और करियर के बीच संतुलन बनाया जा सकता है।वह रोहित और आरव से फिर जुड़ने की कोशिश में है। रिश्ता वैसा न हो सका, लेकिन एक संवाद फिर से बना है।

सपनों को उड़ान दीजिए, पर याद रखिए—आसमान में उड़ते वक्त ज़मीन से जुड़ाव न छूटे। सफलता तभी संपूर्ण है जब उसमें अपनों का साथ हो।



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