प्रेरणा

 शाम का समय था। आसमान पर ढलती हुई धूप सुनहरी चादर ओढ़े हुए थी। नेहा,जो कि एक मल्टीनेशनल कंपनी में इंजीनियर थी और छुट्टियों में बेंगलुरु से अपने गांव आई हुई थी ।वह मअपने ता-पिता के साथ घर के आंगन में बैठी थी। हल्की-हल्की ठंडी हवा चल रही थी, और माँ ने गरमा-गरम अदरक वाली चाय और पकौड़े बना दिए थे। नेहा की हँसी पूरे आंगन में गूंज रही थी, जब वह अपने ऑफिस के मज़ेदार किस्से सुना रही थी। उसके पापा भी मुस्कुरा रहे थे, और माँ बीच-बीच में टोककर हँसी में शामिल हो रही थीं।

इसी खुशनुमा माहौल में नेहा की बड़ी ताई जी, यानी पिताजी की भाभी, अचानक दरवाजे पर आ पहुँचीं। उनके चेहरे पर गर्व की मुस्कान थी और आँखों में चमक।

"अरे वाह ताई जी! आइए-आइए, बैठिए," नेहा ने कहा और ताई जी के लिए कुर्सी खींच दी।


ताई जी ने बैठते ही कहना शुरू किया, " अरे नेहा बिटिया तू कब आई ? वैसे मैं भी तो यहाँ नहीं थी।मायके गई थी।तुम लोगों को पता है, हमारे मायके में मेरी भतीजी की शादी हुई है... डॉक्टर है वो! और क्या शान से हुई है शादी! लड़के वाले तो  बड़ी पार्टी हैं, लड़का बड़ा सरकारी अधिकारी है।और हमारे भाई साहब ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी—बीस लाख का दहेज दिया है, और एकदम नई मर्सिडीज़ भी! पूरा इलाका देखता रह गया।"यह सुनते ही नेहा का चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया। वह कुछ पल शांत रही, फिर बोली, "ताई जी, आपकी भतीजी को डॉक्टर बनने का क्या फायदा हुआ अगर उसे भी शादी के लिए इतना दहेज देना पड़ा? अरे कुछ तो फर्क होना चाहिए कम पढ़ी-लिखी दहेज देकर शादी करने  को मजबूर लड़कियों और पढ़ी लिखी लड़की में।उसकी पढ़ाई-लिखाई सिर्फ दिखावे के लिए थी?"ऐसा लग रहा है जैसे शादी ना हो कोई बिजनेस डील हो। एक तो मां-बाप पढ़ाई लिखाई का खर्च उठाएं ऊपर से यह भारी भरकम दहेज देकर अच्छा लड़का खरीदें। और मैं तो कहती हूं किसी भी लड़की को दहेज देकर शादी के लिए तैयार नहीं होना चाहिए। लेकिन अगर शिक्षित लड़कियां है या शुरुआत नहीं करेंगे तो बाकियों का क्या?

पहले तो नेहा की बात सुनकर ताई जी चौंकीं, फिर कुछ खीझते हुए बोलीं, "अरे पगली! क्या तू सोचती है तेरी शादी बिना दहेज के हो जाएगी? अच्छे लड़के दहेज के बिना कहाँ मिलते हैं? पढ़ाई-लिखाई तो ठीक है, लेकिन समाज की रीत तो  दृढ़ स्वर में बोली, "ताई जी, मुझे समाज की वो रीत नहीं निभानी जो मेरी या किसी लड़की की कीमत लगाती हो। और हां आप लोग हमारे यहां लिए जीवनसाथी ढूंढते हो या खरीद के लाते हो? अगर पढ़ाई करके भी हमें दहेज देना ही पड़े, और यह सोच ना बदल सके तो फिर ये पढ़ाई किस काम की?"ताई जी को नेहा का यों  ढिठाई से जवाब देना कुछ अच्छा नहीं लगा ।वातावरण थोड़ा तनावपूर्ण हो गया। ताई जी कुछ देर बुदबुदाती रहीं, फिर बहस को टालते हुए चाय पीने लगीं।समय बीतता गया। कुछ महीनों बाद नेहा की शादी की बात चलने लगी। माता-पिता उसके लिए अच्छे और पढ़े-लिखे परिवार देख रहे थे। कई अच्छे प्रस्ताव आए, लेकिन जैसे ही दहेज की बात सामने आती, नेहा साफ़ मना कर देती।

"मैं किसी ऐसे घर में नहीं जाऊँगी जहाँ मेरी कीमत दहेज से तय की जाए," वह हर बार यही कहती।

माँ-पापा थोड़े चिंतित हो जाते, पर नेहा का आत्मविश्वास उन्हें ढाढ़स देता।

फिर एक दिन, एक इंजीनियर लड़के का रिश्ता आया। लड़का अमेरिका में नौकरी करता था, परिवार शिक्षित और समझदार था। जब बातचीत के दौरान नेहा के पापा ने दहेज की बात छेड़ी, तो लड़के के पिताजी ने मुस्कराकर कहा, "हमें अपनी बहू चाहिए, उसका करियर, उसके संस्कार। भगवान का दिया काफी कुछ है हमारे पास दहेज की हमें कोई ज़रूरत नहीं।"

आज नेहा के माता-पिता काफी खुश थे। अब नेहा के पास में  शादी के लिए मना करने की कोई वजह नहीं थी। वह शादी के लिए तैयार हो गई।


शादी बड़े ही धूमधाम लेकिन गरिमा के साथ संपन्न हुई। जो लोग पहले यह कहकर नेहा के माता-पिता को यह कहते थे कि बिना दहेज की तो तुम्हारी बेटी की शादी होने से रही। आज वही लोग नेहा के निर्णय की सराहना कर रहे थे।नेहा ने अपने निर्णय से समाज को एक संदेश दिया — कि पढ़ी-लिखी लड़कियों को न केवल दहेज न देने का हक़ है, बल्कि उसका विरोध करना भी उनकी नैतिक ज़िम्मेदारी है।और इस तरह, नेहा केवल एक बहू नहीं बनी — वह बदलाव की एक प्रेरणा बन गई।

"हमें अपनी बेटियों को सिर्फ पढ़ाना ही नहीं, उन्हें यह हक़ भी देना होगा कि वे अपनी शर्तों पर ज़िंदगी जिएँ। अगर दहेज के बिना समाज हमें अपनाने को तैयार नहीं, तो ऐसा समाज बदलना ज़रूरी है।

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