अनोखी विदाई
"साक्षी बेटा, थोड़ा सा तो कुछ खा ले। दो दिन हो गए आखिर कब तक भूखी प्यासी बैठी रहोगी? देखो बेटा जो भी हुआ उसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं। ईश्वर की मर्जी के आगे किसकी चली है?"रख दो मां, मैं बाद में खा लूंगी।"संगीता जी बेटी के कमरे में खाना रखकर बाहर आ गई लेकिन थोड़ी देर पहले बेटी को समझा रही संगीता जी बाहर आकर खुद ही अपने आंसुओं को ना रोक सकीं। कौन कहेगा कि दो दिन पहले ही साक्षी का विवाह हुआ है। 2 दिन पहले तक जहां चारों ओर विवाह की खुशियां और उत्सव का माहौल था, वहीं अब दोनों घरों में मातम पसरा हुआ था।हरिशंकर जी और उनकी पत्नी सुमित्रा देवी ने इस शादी के लिए महीनों से तैयारी की थी। बड़े बेटे की शादी उनकी जिंदगी का सपना थी, और आज वो दिन आ गया था। बारात पूरे हर्षोल्लास से दुल्हन के घरपहुँची। वहाँ भी स्वागत बड़े प्रेम और सम्मान के साथ हुआ। रातभर रस्में चलीं, हँसी-मज़ाक से माहौल जीवंत था।लेकिन किसे पता था कि सुबह होते ही सबकुछ बदल जाएगा।
सुबह विदाई की तैयारी हो रही थी। लड़की पक्ष के लोग भावुक थे, दुल्हन रो रही थी, और घर के लोग उसे सँभालने में लगे थे। अचानक मिश्रा परिवार की तरफ से शोर-शराबा सुनाई देने लगा। हरिशंकर जी को अचानक सीने में तेज़ दर्द उठा और वे ज़मीन पर गिर पड़े। बारातियों में अफरा-तफरी मच गई। तुरंत डॉक्टर को बुलाया गया, लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका।
वो घर जो कल तक गीतों से गूंज रहा था, आज चीत्कारों से भर गया।
हर किसी की आँखों में आंसू थे। दूल्हा अमित सदमे में था,उसका छोटा भाई राजू रोता हुआ एक कोने में बैठ गया।
इस माहौल में दुल्हन की विदाई कैसे होती?
वहाँ मौजूद कुछ रिश्तेदारों ने सलाह दी कि दुल्हन को अभी मायके में ही रहने दिया जाए। कुछेक ने तो और भी ज़हरीली बातें शुरू कर दीं।
"ये तो बहुत अशुभ घड़ी थी, तभी तो ऐसा हुआ..." कुछ लोग दबी जुबान में कहने लगे की "बहू तो आते ही ससुर को ले गई... अपशकुनी है ये लड़की..."
"ऐसी बहू को घर मत लाओ, कुछ औरतों में अपशकुन होती है..."
धीरे-धीरे ये बातें पूरे गाँव में फैल गईं।
उधर दुल्हन पक्ष भी डर और चिंता में था। लड़की की माँ सिसकते हुए बोली – "क्या हमारी बेटी का यही नसीब है? शादी के अगले ही दिन ऐसी स्थिति में..."बारात बिना दुल्हन के ही वापस चली गई। घर पहुंचने के बाद वहां का माहौल बहुत दारुण हो चुका था।अमित कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं था, और सुमित्रा देवी तो जैसे गहरे सन्नाटे में डूबी थीं। थोड़ी देर बाद, अंतिम संस्कार की सारी रस्में पूरी हो चुकी थीं, फिर दिन बीते और 13वीं की रस्म भी पूरी हो गई। लेकिन सब लोग एक अजीब असमंजस की स्थिति में बैठे थे —की साक्षी का क्या किया जाए ?सुमित्रा देवी उठीं। उन्होंने अपना सिर ढँका, आँखों के आँसू पोंछे और शांत लेकिन दृढ़ स्वर में बोलीं –"मैं साक्षी को विदा कर कर ले आऊंगी" "लेकिन भाभी क्या ऐसी लड़की को घर लाना सही रहेगा?"अमित की बुआ जी ने चिंता जताते हुए कहा।"
" जो हुआ, वह विधि का विधान था। मेरे पति का समय यहीं तक था। इसमें मेरी बहू का क्या दोष? उसे क्यों दोष दिया जा रहा है?"सभी लोग चुप हो गए।
"मुझे मेरी बहू चाहिए। वह मेरे बेटे की अर्धांगिनी है। मेरा परिवार अभी अभी टूटा है, मैं उसे जोड़ना चाहती हूँ, और बिखराना नहीं। मैं स्वयं जाकर अपनी बहू को विदा कराकर लाऊँगी।"
सभी हक्के-बक्के रह गए। किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि जिसने अभी-अभी अपने पति को खोया है, वह औरत इस परिस्थिति में भी इतना बड़ा और मानवीय निर्णय ले सकती है।
सुमित्रा देवी ने अपने छोटे बेटे को साथ लिया और दुल्हन के घर पहुँचीं। उधर लड़की के माँ-बाप सहमे हुए थे, मन में अनगिनत सवाल और डर लिए हुए। जब उन्होंने सुमित्रा देवी को दरवाजे पर खड़ा पाया, तो आश्चर्य और भावनाओं से भर गए।
सुमित्रा देवी ने अपनी बहू को गले लगाया, उसके आँसू पोंछे और बहुत कोमलता से कहा –
"बेटी, चलो। अब तुम्हारा घर तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है।"
दुल्हन फूट-फूटकर रो पड़ी। उसके माता-पिता की आँखों में अब डर नहीं था, बल्कि एक सच्चे रिश्ते की गर्माहट और सम्मान के आँसू थे।
गाँव लौटते समय लोगों की सोच भी बदलने लगी थी। जिन लोगों ने बहू को अपशकुनी कहा था, वही अब सुमित्रा देवी की प्रशंसा कर रहे थे। लोग कह रहे थे — "ऐसी माँ ही समाज की असली रीढ़ होती है। जिसने परंपरा नहीं, इंसानियत को चुना।"
सुमित्रा देवी ने बहू का स्वागत घर में वैसा ही किया जैसा पहले से तय था। हालांकि शहनाइयाँ अब नहीं बजीं, लेकिन घर में एक नई शुरुआत की लौ जरूर जली।
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