अपनापन



निया एक  चंचल स्वभाव की लड़की थी। शहर की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में वह अपने पापा के साथ अकेली एक फ्लैट में रहती थी। उसकी मां को गुज़रे कई साल हो चुके थे। उसका कोई भाई बहन भी नहीं था। हर शाम निया अपने ऑफिस से लौटकर पास के एक छोटे से पार्क में टहलने जाती थी। वो कुछ वक्त खुद के साथ बिताना चाहती थी — प्रकृति की गोद में, हलकी हवा में, और कभी-कभी किताबों के साथ।एक दिन, जब सूरज ढलने को था और आसमान हलके नारंगी रंग में रंग चुका था, निया पार्क में टहल रही थी। तभी उसने देखा कि एक बुजुर्ग व्यक्ति,  जिन्हें वह प्रतिदिन उस  पार्क में टहलते हुए देखतो थी।अचानक ठोकर लगने से गिर पड़े। निया तुरंत दौड़कर उनके पास पहुँची और उन्हें सहारा देकर उठाया।"अंकल जी, आपको कहीं चोट तो नहीं लगी?" उसने चिंता भरे स्वर में पूछा।


बुजुर्ग ने मुस्कराकर कहा, "नहीं बेटा, मैं ठीक हूं। बस थोड़ी सी ठोकर लग गई थी। कुछ उम्र का  भी असर है बस, अब ये टांगें भी कब साथ छोड़ दें, क्या पता।"निया ने उनका हाथ थामा और पास की बेंच पर बैठा दिया। उनका नाम वर्मा जी था — विनोद वर्मा। बातचीत के दौरान उन्होंने एक भारी सांस लेते हुए कहा, "अब तो बेटा, ज़िंदगी से कोई खास लगाव नहीं रहा। बस जी रहे हैं, जैसे तैसे।"निया ने उनकी ओर देखा और मुस्कराते हुए बोली, "अंकल जी, जब तक हम इस दुनिया में हैं, ज़िंदगी से प्यार करना चाहिए। हमें हर पल का सम्मान करना चाहिए। आप ऐसी उदासी भरी बातें क्यों करते हैं?"मेरे पापा भी कभी-कभी ऐसी ही बातें करते हैं तो मैं उन्हें बहुत डांट लगाती हूं।वर्मा जी उसकी बात पर मुस्कराए और बोले, "तुम ठीक कहती हो। तुमसे मिलकर अच्छा लगा बेटा।"उस दिन के बाद निया रोज़ शाम को वर्मा जी से पार्क में मिलती। दोनों के बीच एक सुंदर दोस्ती पनपने लगी। कभी मौसम की बात होती, तो कभी पुरानी यादों की, कभी घर परिवार की। वर्मा जी के दोनों बेटे अमेरिका में जा बसे थे। बड़ा बेटा डॉक्टर और छोटा  बेटा सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। दोनों साल  दो साल पर कभी कभी परिवार सहित घर आते  थे तो घर में रौनक लगी रहती थी। उनके जाने के बाद फिर वही एकाकी जीवन। वर्मा जी को निया के रूप में एक ऐसी बेटी मिल गई थी, जो अपनेपन का एहसास दिलाती थी। एक दिन बातों ही बातों में निया ने वर्मा जी से कहा "अंकल आप तो फिर भी खुशकिस्मत हैं कि आपके साथ सुख-दुख बांटने के लिए आंटी हैं ।लेकिन, मेरे पापा तुम मेरे ऑफिस जाने के बाद पूरा दिन घर में अकेले रहते है।"एक शाम वर्मा जी ने निया से कहा, "बेटा, कभी अपने पापा को भी लेकर आओ। मैं भी उनसे मिलना चाहूंगा। और तुम्हारी आंटी भी कबस तुमसे मिलना चाहती है।"अगले रविवार को निया अपने पापा के साथ वर्मा जी के घर गई। जैसे ही दरवाज़ा खुला, वर्मा जी की पत्नी, मिसेज वर्मा, उन्हें देखकर मुस्कराईं, "अरे आप! आप तो पास की बिल्डिंग में ही रहते हैं न? कई बार आपको उस बिल्डिंग से निकलते हुए देखा है।"निया के पापा भी चौंके, "हां! हम तो सालों से पास में रह रहे हैं। पर शायद आज के ज़माने में पड़ोसी भी अनजान हो जाते हैं।"उस शाम चाय के साथ पुरानी बातें शुरू हुईं और तीनों बुज़ुर्गों के बीच दोस्ती की एक नई शुरुआत हुई। अब रोज शाम निया के साथ तीनों पार्क में बैठते, हँसी-मजाक करते,  जीवन के अनुभव साझा करते।छुट्टियों के दिन प्रायः दोनों परिवार एक साथ बिताते। श्रीमती वर्मा निया को नई-नई डिशेस बनाना सिखाती। बरसों से मां के प्यार को तरसती निया को मिसेज वर्मा में मां की छवि नजर आती थी। वही तीनों ही बजुर्ग अब बड़े खुश नजर आते थे ।निया उनके  बीच एक पुल बन गई थी — अकेलेपन और अपनत्व के बीच का पुल।अब निया के लिए पार्क सिर्फ टहलने की जगह नहीं रहा — वो एक रिश्तों की बगिया बन चुका है। दोस्तों, पहले के समय में रिश्तो का दायरा केवल अपने परिवार और बच्चों तक न होकर संयुक्त परिवार ,आस पड़ोस नाते रिश्तेदारों  तक फैला हुआ था। लेकिन आज हम जितना ही अपने  छोटे से परिवार तक सिमटते जा रहे हैं। समय के साथ उतने ही अकेलेपन का शिकार होते जा रहे हैं। जरूरी नहीं कि केवल खून के रिश्तों में ही अपनापन हो। जो समय पर हमारे सुख दुख का भागीदार बन जाए आज वही अपना है।

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