असली दौलत
अजय आज कुछ देर से ऑफिस से लौटा। शनिवार का दिन था दोस्तों के साथ पार्टी करने का प्लान बन गया था, तो ऑफिस से आते-आते देर हो गई। जैसे ही वह दरवाजा खोलने लगा, देखा दरवाजे के पास एक चिट्ठी पड़ी हुई है। आज के समय में भला चिट्टियां कौन लिखता है? पत्र उठा कर घर के अंदर आया और बैग एक तरफ रखकर चिट्ठी खोलकर देखी , उसकी मां का पत्र था। बेटा ,हम सब यहां ठीक हैं। खेत वही हैं, पीपल वही है, बस तू अब कम दिखाई देता है। याद है तुझे वो लकड़ी का झूला जो तूने खुद लगाया था? आज भी राजू वहीं झूलता है। हम तुझसे ज्यादा कुछ नहीं चाहते, बस कभी-कभी तेरा चेहरा देख लें, इतना ही बहुत है। तुम्हारी मां !अजय ने जब ये चिट्ठी पढ़ी, तो उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसे एहसास हुआ कि उसने सफलता के लिए भागते समय अपने अपनों को पीछे छोड़ दिया है। उसकी मां अतीत में खो जाता है।
छोटे से गाँव बड़ौली में एक बड़ा सा पीपल का पेड़ था, जिसके नीचे बैठकर बुज़ुर्ग अपनी कहानियाँ सुनाया करते थे। इसी गाँव में रहता था एक परिवार—दीनानाथ, उनकी पत्नी गीता, और उनके तीन बच्चे: अजय, नीना और छोटा राजू।दीनानाथ किसान थे, मेहनती और ईमानदार। खेतों से जो उपज मिलती, उसी से पूरे घर का खर्च चलता। गीता घरेलू महिला थीं, पर उनकी दूरदर्शिता और समझदारी ने हमेशा घर को बिखरने नहीं दिया।समय के साथ बच्चे बड़े होने लगे। अजय पढ़ाई में होशियार था, उसे शहर जाकर पढ़ने का मन था। नीना को सिलाई और कढ़ाई में रुचि थी, और राजू तो अभी बस खेल-कूद में लगा रहता था।अजय ने पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन किया और स्कॉलरशिप पर शहर की यूनिवर्सिटी चला गया। पढ़ाई खत्म हुई । उसकी मेहनत रंग लाई और आज वह एक अच्छे पद पर काम कर रहा है।शुरू में वो हर हफ्ते फोन घर पर करता, माँ-बाबूजी का हालचाल लेता, पर समय के साथ उसकी व्यस्तता बढ़ती गई और वह शहर की चकाचौंध में खोता चला गया।और घर पर बातचीत कम होती गई। उसे घर गए हुए भी काफी समय बीत चुका था।इधर उसकी छोटी बहन नीना ने गाँव में ही एक छोटा सा सिलाई सेंटर खोल लिया। महिलाएं वहाँ सीखने आने लगीं, और उसने माँ के साथ घर के कामों में भी हाथ बंटाना शुरू कर दिया। राजू अभी छोटा था सो हुआ स्कूल से आने के बाद खेलकूद में लगा रहता था। लेकिन वह भी हमेशा अपनी मां से पूछता कि "मां भैया कब आएंगे?"मां बेचारी क्या जवाब दे ।क्योंकि दीनानाथ और गीता को सबसे ज़्यादा चिंता अब अजय की ही थी। शहर की चकाचौंध में कहीं वो अपने परिवार को न भूल जाए।लेकिन आज मां के लिखे इस पत्र ने जैसे अजय को नींद से जगा दिया हो,अजय ने बिना देर किए घर आने की योजना बनाई। जब वो गाँव पहुँचा, तो माँ ने जैसे ही उसे देखा, दौड़कर गले से लगा लिया। दीनानाथ ने बस उसकी पीठ थपथपाई—उनकी आँखें सब कह रही थीं। राजू और नीना बड़े भैया को देख कर बड़े ही खुश थे। मां ने आज अजय के पसंद की खीर बनाई। आज इतने दिनों बाद मां के हाथों का बना खाना अजय को शहर के बड़े-बड़े रेस्टोरेंट का खाने से भी कहीं ज्यादा स्वादिष्ट लग रहा था। उसके मन को काफी दिनों के बाद अजीब सी शांति महसूस हो रही थी। ऐसा सुकून उसे शहर में ऊंचा पद और पैसे कमाकर भी कभी नहीं मिला था।कुछ दिनों घर पर रहकर वापस शहर चला गया लेकिन अब वह हर महीने घरआता था।अजय ने शहर से एक लैपटॉप और प्रिंटर लाकर नीना के सिलाई सेंटर को डिजिटल बना दिया। राजू को पढ़ाई में गाइड करने लगा और खेतों के लिए एक छोटी सी सौर ऊर्जा परियोजना भी शुरू की। अब वह यह समझ गया था कि परिवार कोई बोझ नहीं, वो तो वो धागा है जो इंसान को ज़मीन से बाँध कर रखता है।
समय चाहे जितना भी बदल जाए, परिवार की अहमियत कभी नहीं बदलती। सच्चा धन वही रिश्ते हैं जो बिना शर्त के साथ होते हैं—बस ज़रूरत है उन्हें समझने और समय देने की।
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