"मॉम,मै आरव के घर जा रहा हूं।आज संडे को उसकी मॉम घर पर होती हैं।आंटी ने कहा है कि वो हमारा स्कूल का एनवायरमेंटल साइंस का प्रोजेक्ट बनवा देंगी। मैं और आरव साथ में यह प्रोजेक्ट कर रहे हैं।"सुबह-सुबह अपने स्कूल बैग में प्रोजेक्ट का सामान भरते हुए मेरे 8 साल के बेटे गर्व ने कहा।" लेकिन बेटा,तुमने मुझे इस बारे में क्यों नहीं बताया? मैं प्रोजेक्ट बनवा देती।"गर्व मेरी बात सुनकर हंसता हुआ कहता है कि"मॉम आप नहीं करवा पाओगे। आंटी बहुत स्मार्ट है बहुत बड़े ऑफिस में काम करती हैं। अगर वह हमारा प्रोजेक्ट करवा रही हैं तो हम जरूर फर्स्ट आएंगे।"कहता हुआ वह अपना सामान उठाकर चला गया। लेकिन सुमन को यह बात धक से लग गई।तो क्या अब क्या मैं अपने बच्चे की नजर में भी...?असल में सुमन एक होनहार महिला थी। पढ़ाई में अव्वल, और एक प्रतिष्ठित कंपनी में अच्छे पद पर कार्यरत। जब उसकी शादी अमित से हुई, तो उसके जीवन में एक नया मोड़ आया। दोनों ने अपने भविष्य के सुनहरे सपने बुने। लेकिन शादी के कुछ सालों बाद, जब उनके दो बच्चे हुए, तो सुमन ने एक कठिन निर्णय लिया—उसने अपनी नौकरी छोड़ दी।सुमन के मन में यह विचार था कि उसके बच्चों को एक माँ की पूरी देखभाल और प्यार मिले। उसने सोचा कि पैसा तो दोबारा कमाया जा सकता है, लेकिन बच्चों का बचपन लौटकर नहीं आएगा। अमित भी शुरू में उसके इस फैसले से सहमत था। घर-गृहस्थी में व्यस्त सुमन ने अपना हर सपना, हर इच्छा, परिवार की खुशियों के आगे तुच्छ समझ लिया। पति और बच्चों को अच्छा से अच्छा बनाना खिलाना, उनका स्कूल बैग तैयार करना, समय पर स्कूल भेजना यही अब उसकी दुनिया थी।
समय बीतता गया। बच्चे बड़े हुए, छोटा बेटा 8 साल का तो बड़ा 11 साल का हो चुका था। दोनों अब अपने स्कूल, दोस्तों, कुल मिलाकर एक नई दुनिया में व्यस्त हो गए। अमित का भी करियर आगे बढ़ा, वह अब एक बड़ा अधिकारी बन चुका था।
धीरे-धीरे, सुमन ने महसूस किया कि उसके त्याग का अब कोई मोल नहीं रहा। जब भी वह कुछ कहती, अमित हँसकर टाल देता—“अरे, तुम घर बैठी हो, तुम्हें बाहर की दुनिया की क्या समझ!” बच्चे भी अब उसकी बातों को महत्व नहीं देते थे।अमित की बातें अक्सर बाहर काम करने वाली महिलाओं की तारीफों से भरी होतीं—“देखो, नीरज की पत्नी कितनी स्मार्ट है। उसे प्रमोशन मिला हैं... और एक तुम हो ,बस घर में बैठकर समय बर्बाद कर रही हो।” उसके त्याग और समर्पण को लोग उसकी मूर्खता समझने लगे थे।
सुमन को अब एहसास हो रहा था कि उसने जो कुछ भी किया, वह शायद सही था, लेकिन उसके परिवार ने उसे कभी उस नज़र से नहीं देखा। वह खुद को ठगा हुआ सा महसूस कर रही थी।
एक दिन उसने अपने पुराने दोस्त को कॉल किया, जो उसकी सहकर्मी हुआ करती थी। "आज तक सब ऑफिस में तुम्हारे काम की सराहना करते हैं। अगर तुमने काम ना छोड़ा होता तो आज काफी ऊपर पहुंच गई होती। बातों-बातों में उसने सुमन से पूछा, “क्यों न तुम फिर से काम शुरू करो? तुम्हारी काबिलियत कहीं नहीं गई, बस थोड़ी हिम्मत जुटानी होगी।”
सुमन को यह विचार झकझोर गया। क्या सच में अब भी वह कुछ कर सकती है? क्या अब भी उसके लिए नया रास्ता खुल सकता है?
उस रात वह बहुत देर तक सोचती रही। अगले दिन, उसने अपने पुराने प्रमाण पत्र और रिज्यूमे निकाले, और नई संभावनाओं की तलाश में जुट गई।शायद देर हो चुकी थी, लेकिन यह उसकी नई शुरुआत थी।
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