सोच
जैसे ही दरवाजे की कॉल बेल बजी । विमला जी दरवाजे की तरफ बढ़ी। निशांत आ गया होगा जाने आज उसका इंटरव्यू कैसा रहा होगा? मन में सोचते हुए उन्होंने दरवाजा खोला। दरवाजा खोलते ही बेटे का बुझा हुआ चेहरा देखकर वह समझ गई कि आज भी कहीं बात नहीं बनी। लेकिन उन्होंने अपने चेहरे से जाहिर नहीं होने दिया। और मुस्कुरा कर बेटे को चाय नाश्ते के लिए पूछने लगी।"नहीं मां रहने दो, मन नहीं है।" कहकर वह अपने कमरे में चला गया।
निशांत एक पढ़ा लिखा और समझदार लड़का था। इसके बाबजूद भी उसे कहीं नौकरी नहीं मिल पा रही थी। उसने बहुत से इंटरव्यू दिए पर कहीं सैलरी कम थी, तो कहीं बात बनते बनते रह जाती। निàशांत के घर में मां और बीमार पिता थे। पापा कुछ सालों से बीमार थे। बीमार पापा की दवाइयों के खर्चे से उनकी जमा की हुई सारी कमाई धीरे-धीरे खत्म होती जा रही थी। इसलिए निशांत को हर हाल में नौकरी चाहिए। पूरे दिन नौकरी ढूंढना और शाम को घर पहुंच कर मां का आशा भरी नजरों से उसे देखना राजीव को बुरी तरह तोड़ देता था। उसे ऐसा लगता मानो मां पूछ रही हो कि "बेटा आज भी तुझे नौकरी नहीं मिली क्या "अपनी ज़िंदगी के दुखों से इतना तंग आ चुका था कि कभी कभी तो उसका मन करता कि वो घर वापस लौट कर ही न आये और कहीं दूर चला जाए।पर अपनी बूढ़े माता-पिता का एकलौता सहारा होने की वजह से वो खुद को बड़ी मुश्किल से समझा लेता और घर वापस लौट आता।
निशांत की ज़िंदगी की ये परेशानियां तो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहीं थीं। वह खुद को अपनी कहानी का एक हारा हुआ नायक मानता था, उसे लगता था कि कहानी का हीरो बनना उसकी किस्मत में ही नहीं है।एक दिन एक दोस्त के रिफरेन्स से निशांत एक बड़ी कंपनी में इंटरव्यू देने पहुंचा और उसकी काबिलियत के बलबूते पर, उसे वो नौकरी भी मिल गई। पूरे दो साल दर-दर भटकने के बाद, आज निशांत के सब्र का फल रंग लाया। नई नौकरी और बढ़िया सैलरी की वजह से वो बहुत खुश था। घर जाते वक्त उसने अपनी मां की पसंद की मिठाई ली और जाकर अपनी मां से लिपट गया। अपने बच्चे की खुशी जानकर उसकी बीमार पिता के शरीर में भी जैसे नई जान आ गयी हो। इंटरव्यू देने पहुंचा और उसकी काबिलियत के बलबूते पर, उसे वो नौकरी भी मिल गई। पूरे दो साल दर-दर भटकने के बाद, आज निशांत के सब्र का फल रंग लाया। नई नौकरी और बढ़िया सैलरी की वजह से वो बहुत खुश था। घर जाते वक्त उसने अपनी मां की के दो दिन बात से ही निशांत की जॉइनिंग थी। नई नई नौकरी पर बनठन कर जाने के लिए उसने शॉपिंग की, और दो दिन बाद नौकरी पर जाने का दिन भी आ गया। मां ने सुबह उठकर बेटे का लंच पैक किया और नाश्ता करके ऑफिस के लिए निकलने वाला था । सामने मां दही चीनी लेकर खड़ी थी। उसने मां के प्यार भरे हाथों से दही-चीनी खाया और जाने लगा, पर तभी अचानक उसके पापा बेहोश होकर ज़मीन पर गिर गए । ये देखकर निशांत बुरी तरह घबरा गया। वो जल्दी से पापा को उठा कर हॉस्पिटल ले गया। वहां डॉक्टरों ने बताया कि घबराने की कोई बात नहीं बस एक दवाई के साइड इफेक्ट की वजह से वह बेहोश हो गए थे, पर अगर उसे समय पर हॉस्पिटल न लाया जाता तो उसकी जान भी जा सकती थी। इन सब में आधा दिन गुज़र गया था और निशांत पहले दिन ही ऑफिस नहीं पहुंचा था।वक्त पर ऑफिस न आने की वजह से उसे लापरवाह समझ कर, उसकी जगह किसी और को रख लिया गया। उसके पापा को हॉस्पिटल से उसी शाम छुट्टी मिल गई थी, पर अपने बेटे की नौकरी छूटने का दोषी खुद को मान कर की आंखों में आंसू आ गए।निशांत को भी अच्छी भली नौकरी चले जाने का हल्का दुख तो था पर उसे इस बात की तस्सली भी थी कि उसके पापा ठीक है। उसके मन में ये ख्याल चल रहा था कि अगर पापा उसके जाने के बाद बेहोश हुए होते तो मां अकेले क्या करती। अगर उनके साथ कोई हादसा हो जाता तो उसे जीवन भर अफसोस होता।ये पहली बार था जब निशांत का मन हल्का था और उसे कोई दुख नहीं था। उसने अपनी मां को समझाया और कहा, “भले ही मुझे इस वक्त नौकरी की ज़रूरत है, पर मां,आप दोनों मेरे लिए उससे भी ज़रूरी हैं! मां ये ज़िंदगी सूरज जैसी है…जो कभी खुशी की तरह उगती है और कभी दुखों की तरह छिप जाती है…और चिंता मत कीजिये आपके बेटे में हुनर है जिसकी वजह से उसे फिर नौकरी मिल सकती है, और स्थितियां हमेशा एक जैसी नहीं रहती। हमारे आसपास देखिए कितने ऐसे लोग हैं जिनके सर पर छत भी नहीं, खाने को दो वक्त की रोटी नसीब नहीं। हम तो फिर भी बहुत अच्छी स्थिति में है।” हमेशा उदास और दुखी रहने वाले बेटे के मुंह से ऐसी सकारात्मक बातें सुनकर निशांत के माता-पिता को बड़ी खुशी हुई। और निशांत भी अब एक सकारात्मक सोच और दुगुने उत्साह के साथ नई नौकरी की तलाश में लग गया।
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