सिन्हा परिवार एक सभ्य और खुशहाल परिवार था। आज घर के बड़े बेटे की शादी थी।घर में नई बहू नेहा का जोर जोर से स्वागत किया। पूरा घर फूलों की लड़ियों और जगमगाती रोशनी से सजा हुआ था। हर लड़की की तरह नेहा के मन में भी ससुराल को लेकर कुछ डर और असमंजस था।नेहा पढ़ी-लिखी और सुसंस्कृत लड़की थी। शादी के बाद उसने जब इस घर में कदम रखा, तो उसे उम्मीद थी कि उसे हर काम अकेले ही संभालना होगा, जैसा उसने अपने बड़े-बुजुर्गों से सुना था। लेकिन जब सुमित्रा देवी ने पहली ही सुबह उसे जल्दी उठने से रोकते हुए कहा, "अरे बहू, आराम कर लो, तुम्हारी भी तो शादी की थकान उतरे। घर का कोई भी काम तुम्हें अकेले नहीं करना पड़ेगा, हम सब मिलकर करेंगे," तो नेहा चौंक गई।
धीरे-धीरे नेहा ने देखा कि यह परिवार सच में बाकी परिवारों से अलग था। सासू माँ उसे बेटी जैसा मानती थीं, ननद पूजा तो उसकी अच्छी दोस्त बन चुकी थी, और देवर राहुल भी उसका बहुत सम्मान करता था। नेहा सास के साथ मिलकर काम करती, लेकिन सुमित्रा देवी कभी उसे मजबूर नहीं करतीं।कुछ ही दिनों बाद घर में एक नई हलचल हुई—अम्मा जी, आ रही हैं। अम्मा जी,यानी अमित की दादी, गांव से आईं। वे पारंपरिक विचारों वाली महिला थीं और मानती थीं कि बहू को घर के सभी काम करने चाहिए, सास को नहीं। जैसे ही उन्होंने घर में कदम रखा, वैसे ही उनकी तेज नजरों ने माहौल का जायजा लेना शुरू कर दिया।उन्होंने देखा कि सुमित्रा देवी नेहा के साथ मिलकर खाना बना रही थीं। सुमित्रा देवी सब्जी काट रही थीं, और नेहा रोटियाँ बेल रही थी। यह देख अम्मा जी का माथा ठनक गया।"ये क्या? बहू के होते हुए तुम सब्जी काट रही हो?" अम्मा जी ने सख्त स्वर में कहा।सुमित्रा देवी मुस्कुराईं, "अम्मा जी, अब जमाना बदल गया है। हम दोनों मिलकर काम कर रहे हैं, इसमें गलत क्या है?"अम्मा जी ने भौंहें चढ़ा लीं और कुछ नहीं कहा, लेकिन उनके मन में यह बात घर कर गई।उस दिन शाम को नेहा अपनी ननद पूजा के साथ बाजार चली गई। घर में अम्मा जी, सुमित्रा देवी, और बाकी लोग बैठे थे। अचानक सुमित्रा देवी उठीं और अम्मा जी के लिए गरमागरम चाय और पकौड़े ले आईं।जैसे ही अम्मा जी ने देखा कि उनकी बहू खुद चाय बनाकर ला रही है, वे भड़क उठीं।"अरे! यह क्या हो रहा है? तुम्हारी बहू कहाँ है? और तुम चाय क्यों बना रही हो? बहू को इतना सिर पर मत चढ़ाओ, कल को तुम पर हुक्म चलाने लगेगी!"सुमित्रा देवी उनकी बात सुनकर मुस्कुराईं। वे अम्मा जी के पास बैठीं और प्यार से उनका हाथ थाम लिया।"अम्माजी आपकी सास ने भी आपके साथ कुछ ऐसी ही सख्ती की थी ना।"अम्मा जी एक पल के लिए खामोश हो गई।"आपको बुरा लगता था ना।"अम्मा जी ने हां में सर हिलाया।"तो फिर वही चक्र क्यों दोहराएं? जब हमें पता है कि किसी को सख्ती सहनी अच्छी नहीं लगती, तो हम अपनी बहू के साथ वैसा क्यों करें? अगर किसी को बदलाव की शुरुआत करनी है, तो वो मैं क्यों नहीं?"अम्मा जी चुप रहीं। उन्होंने पहली बार सोचा कि सच में, अगर हर सास अपनी बहू को बेटी की तरह माने, तो घर में कभी कलह न हो।
थोड़ी देर बाद नेहा और पूजा वापस आईं। नेहा बाजार से मिठाइयाँ और फल लेकर आई थी। जैसे ही वह अंदर आई, उसने अम्मा जी के पास जाकर कहा, "दादी माँ, आपके लिए आपकी पसंदीदा मिठाई लाई हूँ!"
अम्मा जी ने पहली बार उसे मुस्कुराकर देखा और मिठाई का डिब्बा हाथ में लिया।"बहू, क्या-क्या खरीदा बाजार से?"यह सुनकर पूरा परिवार चौंक गया। अम्मा जी ने पहली बार नेहा को बहू की तरह नहीं, बल्कि परिवार के हिस्से की तरह स्वीकार किया था।सुमित्रा देवी और नेहा एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराईं। बदलाव की एक नई शुरुआत हो चुकी थी।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें