चौधरी निवास में परिवार के मुखिया, रामप्रसाद चौधरी, और उनकी पत्नी, सरला देवी, अपने दो बेटों—रवि और मोहन—और उनकी पत्नियों—सीमा और पूजा—के साथ सुखी जीवन बिता रहे थे। घर में सबका एक-दूसरे के प्रति सम्मान था, लेकिन यह शांति तब भंग हो जाती जब नीता, उनकी शादीशुदा बेटी, मायके आती।नीता की शादी काफी रईस परिवार में हुई थी, लेकिन जब भी वह मायके आती, अपनी भाभियों में कोई न कोई कमी निकालती रहती। कभी सीमा के बनाए खाने में नुक्स निकालती—"भाभी, तुम्हारा खाना तो बिलकुल बेस्वाद होता है, पता नहीं भैया कैसे खाते हैं!"तो कभी पूजा के कपड़ों पर तंज कसती—"अरे पूजा, तुम्हें अच्छे कपड़े पहनने की समझ नहीं है क्या? ये रंग तो तुम्हें सूट ही नहीं करता! जाने तुम लोगो को नए फैशन की समझ कब आएगी।"यह सब वह इस अंदाज में कहती कि उसकी माँ, सरला देवी, भी उसकी हाँ में हाँ मिला देतीं। वह अपनी बेटी की बातों में इतनी उलझ जातीं कि बिना कुछ सोचे-समझे बहुओं को टोकने लगतीं। वैसे बहुएं भी अच्छे और संपन्न परिवार से थी और काफी पढ़ी-लिखी भी थी।सीमा , बड़ी बहू स्वभाव से शांत थी, इसलिए वह हर बार मुस्कुराकर बात टाल देती, लेकिन शोख और चंचल पूजा को यह बर्दाश्त नहीं था।वह तो अपनी जेठानी सीमा के समझाने के कारण चुप रह जाती थी।
एक दिन की बात थी, घर में सब दोपहर के खाने के लिए बैठे थे। सीमा ने बड़े मन से खाना बनाया था, लेकिन जैसे ही नीता ने पहला कौर लिया, उसने मुँह बिगाड़ते हुए कहा—"भाभी, तुम्हारा खाना तो हमेशा फीका ही होता है! मां से सीखो कुछ, वो तो इतने स्वादिष्ट खाना बनाती हैं! और तो और मेरे ससुराल में भी मेरे बनाए खाने की तो इतनी तारीफ होती है कि पूछो मत।,"सीमा ने हल्की मुस्कान दी और चुप रही, लेकिन पूजा के सब्र का बाँध अब टूटने लगा था। शाम को सभी के बाहर जाने का प्रोग्राम था।फिर, जैसे ही पूजा नई साड़ी पहनकर आई, तो नीता। ने ताना मारा—
"पूजा, तुम्हें रंगों की समझ है भी या नहीं? यह साड़ी तुम पर जच ही नहीं रही!"पूजा ने बड़े मन से वह साड़ी पहनी थी। अब उसके सब्र का बांध टूट चुका था।पूजा ने मुस्कुराते हुए कहा, "दीदी, आप सही कह रही हैं। हमें तो कपड़े पहनने और खाना बनाने का सलीका ही नहीं आता। "आपकी शादी को 5 साल हो गए। 5 सालों में आपने तो काफी अच्छे तौर तरीके सीख लिए। अच्छा खाना, अच्छा पहनना, अच्छे तरीके से रहना। अच्छा एक बात बताना दीदी क्या आपको यह सब आपकी ननद ने सिखाया है?"नीता ने इतराते हुए कहा"वह क्यों सिखाएं ,मुझे यह सब खुद आता है मैं अपनी मर्जी का बनाती हूं ,अपनी मर्जी का खाती हूं, अपनी मर्जी का पहनती हूं। मुझे भला किसी से सीखने की क्या जरूरत? अरे मैं क्या कोई दूध पीती बच्ची हूं?"नीता अपनी ही धुन में बोलती चली जा रही थी।"तो दीदी दूध पीते बच्चे तो हम भी नहीं है तो क्यों नहीं ,आप हमें अपने हिसाब से रहने देती है? पूजा के अचानक पूछे गए सवाल से नीता झेप सी गई। और उसे अपनी गलती का एहसास भी हुआ कि वह अपनी भाभियों पर जरूरतसे ज्यादा रोक-टोक कर रही है। उसने उसे दिन सेअपनी भाभियों से ऐसा न करने का वादा किया। उसके बाद से नीता जब भी मायके आती है। पूजा और सीमा से हिल मिलकर रहती है अब उन्हें भी उसका आना खुशी देता है ना की परेशानी।
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