संघर्ष
"क्या हुआ अर्जुन?क्या सोच रहे हो"श्रीवास्तव सर की आवाज सुनकर अर्जुन ने उनकी तरफ देखा फिर सिर झुका लिया और धीरे से बोला, "सर, मेरे पास नई क्लास में पढ़ाई के लिए किताबें तक नहीं हैं। मैं पढ़ना चाहता हूं लेकिन लगता है, मेरा आगे पढ़ने का सपना कभी पूरा नहीं होगा।"श्रीवास्तव सर मुस्कुराए और बोले, "बेटा, संसाधनों की कमी सफलता को नहीं रोक सकती, अगर मेहनत और हिम्मत हो तो। तुम किताबों की चिंता मत करो, मैं उनका इंतजाम करवाता हूं।और मैं तुम्हें रोज़ एक घंटे पढ़ाऊँगा। लेकिन वादा करो, कभी हार नहीं मानोगे!"यह कहानी है अर्जुन की जिसने अभी अभी दसवीं की परीक्षा अच्छे नंबरों से पास की थी।
अर्जुन एक छोटे से गाँव में रहने वाला लड़का था। उसका परिवार बहुत गरीब था। उसके पिता खेतों में मजदूरी करते थे और माँ सिलाई करके घर चलाने में मदद करती थीं। अर्जुन पढ़ाई में होशियार था, लेकिन परिस्थितियाँ उसके खिलाफ थीं। कभी-कभी उसके पास स्कूल जाने के लिए चप्पल तक नहीं होती थी। कॉपी ,किताब तो वह बड़ी मुश्किल से खरीद पाता था,लेकिनश्रीवास्तव सर की बातें सुनकर अर्जुन की आँखों में उम्मीद की किरण जागी। उसने ठान लिया कि चाहे कितनी भी मुश्किलें आएँ, वह अपने सपनों के लिए लड़ेगा।अर्जुन दिन में स्कूल जाता, स्कूल से लौटकर वह खेतों में पिता के साथ काम करता, और रात में पढ़ाई करता। कभी-कभी वह स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठकर पढ़ता था। गाँव के कुछ लोग उसका मज़ाक उड़ाते, कहते, "इस लड़के को जाने क्या सूझी है, आखिरकार इसे भी खेत में ही काम करना पड़ेगा!" लेकिन अर्जुन ने किसी की बातों पर ध्यान नहीं दिया।गाँव में कोचिंग या इंटरनेट जैसी सुविधाएँ नहीं थीं, लेकिन अर्जुन ने सरकारी लाइब्रेरी में जाकर किताबें पढ़नी शुरू कीं।12वीं की परीक्षा में उसने टॉप किया, लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए पैसे नहीं थे। उसने कॉलेज में एडमिशन के लिए कई जगह कोशिश की, लेकिन फीस एक बड़ी बाधा थी।
इसी दौरान उसने एक स्कॉलरशिप परीक्षा दी। अर्जुन को पूरा भरोसा था कि वह पास हो जाएगा। लेकिन जब रिजल्ट आया, तो वह एक नंबर से असफल हो गया।यह उसके जीवन की सबसे कठिन घड़ी थी। एक पल को उसे लगा कि सब खत्म हो गया। लेकिन तभी उसे श्रीवास्तव सर की बातें याद आईं—"हार मानने वाले कभी जीतते नहीं।"अर्जुन ने हिम्मत जुटाई और फिर से परीक्षा दी। इस बार उसने न सिर्फ पास किया, बल्कि राज्यभर में पहला स्थान प्राप्त किया और उसे पूरी स्कॉलरशिप मिली! कॉलेज में भी अर्जुन ने कड़ी मेहनत जारी रखी। उसने प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी शुरू कर दी। उसने खुद से वादा किया था कि वह एक बड़ा अधिकारी बनेगा और अपने गाँव के बच्चों के लिए शिक्षा की रोशनी फैलाएगा।
कई सालों की मेहनत के बाद, अर्जुन ने सिविल सर्विस परीक्षा पास कर ली और एक बड़ा अधिकारी बन गया। जिस गाँव के लोग कभी उसकी हंसी उड़ाते थे, वही लोग अब उसे गर्व से देखते थे।
उसने गाँव में एक। पुस्तकालय बनवाया और उन बच्चों की मदद की, जिनके पास संसाधन नहीं थे।वह नहीं चाहता था कि कोई भी बच्चा अभाव के कारण शिक्षा के प्रकाश से वंचित रहे।
आज जब अर्जुन गाँव लौटता है, तो बच्चे उसकी ओर देखते हैं और सोचते हैं—"अगर अर्जुन भैया कर सकते हैं, तो हम भी कर सकते हैं!"आज उसने अपने जैसे कितने ही बच्चों को संघर्ष की राह दिखा दी है।
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