रिमझीम
गर्मियों की सुनहरी शाम थी। मेहंदी की महक हवाओं में घुली हुई थी, और घर में शादी की तैयारियाँ पूरे जोर-शोर से चल रही थीं। पूरा घर मेहमानों से भरा पड़ा था । हल्दी की रस्म के लिए पीले रंग के शरारे में सजी, रिमझिम का रूप बिल्कुल चांदनी की तरह दमक रहा था।। लेकिन उसकी आँखों में खुशी के साथ-साथ एक जिद भी साफ झलक रही थी।"मेरा कन्यादान बुआ ही करेंगी," रिमझीम ने यह बात पूरे परिवार के सामने ठान ली थी।
उसकी यह बात सुनकर उसके माँ और पिताजी ने एक-दूसरे की ओर देखा, और नजरें। झुका ली,उसकी बुआ रमा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, "लेकिन बेटा, यह परंपरा माता-पिता निभाते हैं। "
रिमझिम ने प्यार भरी लेकिन दृढ़ आवाज में जवाब दिया, "मेरे लिए आप ही मेरी माँ हैं। आपने ही मेरे लिए सब कुछ किया है।"थोड़ी देर कमरे में खामोशी छाई रही फिर सभी बाहर जाकर अपने-अपने कामों में लग गए।, कमरे में बैठी रमा, अतीत में खो गई।जब रिमझीम का जन्म हुआ था, पूरे घर में खुशियाँ छा गई थीं। उसकी माँ, सविता, और दादी उसे गोद में लिए घंटों निहारा करतीं। उसके छोटे-छोटे हाथ और गुलाबी गाल सबका दिल जीत लेते थे। जब रिमझिम ने चलना शुरू किया उसके पैरों में बंधे पायल की छोटी-छोटी घुंघरुओं की झंकार से पूरे घर में खुशी की लहर दौड़ जाती थी। रमा तब कॉलेज में पढ़ रही थीं। अपनी छुट्टियों के दौरान वह अपनी भतीजी के साथ हर पल बितातीं—कभी उसे कहानियाँ सुनातीं, तो कभी झूले पर झुलातीं। धीरे-धीरे समय बिता और रमा का विवाह हो गया। एक ही शहर में ससुराल होने के कारण वह बराबर अपने परिवार से मिलने आया करती और नन्ही रिमझिम के साथ मिलकर बहुत मस्ती करती। मां और दादी की दुलारी, पापा की परी और बुआ की लाडली रिमझिम पूरे परिवार की खुशियों का केंद्र बिंदु बन गई थी।लेकिन एक दिन नियति ने ऐसा खेल खेला कि सब कुछ बदल गया। एक सड़क दुर्घटना ने उनके जीवन को झकझोर कर रख दिया। रिमझिम की मां और दादी एक सड़क हादसे में चल बसीं। पूरे घर में मातम छा गया। 5 साल की मासूम रिमझिम की आँखों में आँसू थे, और वह समझ नहीं पा रही थी कि उसकी माँ कहाँ चली गई थीं।
रमा ने तुरंत फैसला किया—वह अपनी भतीजी को अपने साथ रखेगी। उन्होंने अपने भाई, राजेश, से कहा, "मैं इसे अपने साथ ले जाती हूँ।आज से यह मेरी जिम्मेदारी है।"उसके बाद रमा ने ने वाकई रिमझिम को एक मां की तरह संभाल लिया।
लेकिन दो साल बाद, रमा को अपने पति के साथ विदेश जाना पड़ा। वह रिमझिम को भी अपने साथ ले जाना चाहती थी लेकिन भाई ने कहा कि "रिमझिम तुम्हारी भाभी की आखिरी निशानी है इसे देखे बिना मैं कैसे रह पाऊंगा।"रमा को भी अपने भैया की बात सही लगी। आज 5 साल बाद वह वापस साल वह बाद भारत लौट रही है। उसके पति की कंपनी ने उन्हें बेंगलुरु भेजने का फैसला किया है । वह कीएयरपोर्ट से अपने घर पहुंच कर नहा धोकर अपने भैया के घर के लिए निकल पड़ती है। उसने उन्हें अपने आने के बारे में बताया नही था। वह उन्हें सरप्राइज देना चाहती थी । इस बीच भैया ने दुसरी शादी कर ली थी। एक बेटा भी हो गया था । उन सब से मिलना था। लेकिन असली तड़प तो रिमझिम से मिलने की थी। जाने पांच सालों में कितनी बदल गई होगी।घर पहुंची तो दरवाजा खुला हुआ ही था। वह सीधे घर के अंदर आ गई। घर में कोई दिखाई नहीं पड़ा। रसोई घर से बर्तनों की खटर पटर की आवाज आ रही थी। वह सीधे रसोई घर में चली गई। एक 11/ 12 साल की दुबली पतली कमजोर सी दिखने वाली लड़की बर्तन मांज रही थी। घर में किसी को आया देख वह लड़की अंदर कमरे में गई। और रमा की नई भाभी को बुला लाई। गोरी चिट्टी फैशनेबल से दिखनेवाली नई भाभी से फोन पर एक एक दो बार बाते हुई थी किंतु आमना सामना नहीं होने के कारण वह रमा को पहचानती नहीं थी। अब भैया तो घर पर थे नहीं तो रमा को खुद ही अपना परिचय देना पड़ा। नई भाभी रमा के स्वागत सत्कार में लग गई।"रिमझिम कहीं दिखाई नहीं पड़ रही है"रमा ने पूछा।"अरे वही तो आपको बिठाकर मुझे अंदर से बुलाकर लाई है।"क्या वह रिमझिम थी?"रमा के इतना आश्चर्य से कहने पर वह थोड़ा सकपका गई और सफाई देने लगी कि "वह आज काम वाली नहीं आई है मैं थोड़ी देर के लिए सोने क्या चली गई रिमझिम ने बर्तन धोना शुरू कर दिया।"तब तक रिमझिम अंदर कपड़े बदलकर अपेक्षाकृत एक ठीक-ठाक फ्रॉक पहन कर बाहर आई। थोड़ी देर में भैया भीऑफिस से आ गए। रमा ने सभी लोगों को उपहार दिए जब रिमझिम को नई फ्रॉक दी तो उसने उसकी आंखों में खुशी की एक छोटी सी झलक देखी। अगले दो दिनों में ही रमा को काफी कुछ समझ में आ रहा था की रिमझिम
अपने पिता के घर में एक नौकरानी की तरह काम कर रही थी। उसकी सौतेली माँ रमा के सामने तो उससे ठीकसे बातें कर लेती थीं लेकिन अकेली होने पर डांट-फटकार से बुलाती थी। वह घर के सारे काम करती, और खेलने-कूदने का तो सवाल ही नहीं था।"रिमझिम को कितना भी मना करूं वह घर के कामों में हाथ लगा ही देती है।"नई भाभी रमा के सामने सफाई देती। एक दिन शाम मे बाहर घूमने का प्रोग्राम बना था।"रिमझिम तुम वही फ्रॉक पहन कर चलना जो मैं तुम्हारे लिए लाई हूं।"रिमझिम की आंखें खुशी से चमक उठी। वह कमरे में तैयार होने चली गई। तभी उसकी नई मां पीछे-पीछे कमरे में आती है।"बुआ के आने से ज्यादा हवा में मत उड़। तू कहीं नहीं जा रही है जल्दी से यह फ्रॉक खोलकर पुरानी फ्रॉक पहन ले और हमारे आने के पहले खाना बनाकर रखना। और हां बुआ से कह देना कि स्कूल का होमवर्क करना है, इसलिए मैं नहीं आ सकती।"किसी काम से उस कमरे में आते हुए रमा ने यह सारी बातें सुन ली। थोड़ी देर में रिमझिम बाहर आई और बाहर जाने के लिए मना कर दिया। रमा की घूमने तो आ गई थी। लेकिन उसका मन बड़ा व्यथित था। क्या यह वही रिमझिम है जिसके एक बार रो देने से पूरा घर, भाभी, मां सब परेशान हो उठते थे। नहीं नहीं मुझे कुछ करना ही होगा अपनी रिमझिम के लिए।रमा ने उस रात अपने भाई से कहा, "आपकी बेटी आपकी ज़िम्मेदारी है। क्या आप देख नहीं रहे कि उसके साथ क्या हो रहा है?"
राजेश ने लाचारी से सिर झुका लिया, लेकिन कुछ कह नहीं पाए।रमा ने हार नहीं मानी। अगली सुबह नाश्ते की टेबल पर रमा ने कहा "दो दिनों के बाद मैं बेंगलुरु जा रही हूं। रिमझिम भी मेरे साथ जाएगी।"ऐसा कैसे हो सकता है? वह चली गई तो.."तो क्या भाभी , आपके घर के काम कौन करेगा?"यह क्या कह रही हैं आप? नई भाभी तुनक गईं और"रिमझिम हमारी बेटी है हम जैसे चाहे उसे रखे।"दो दिनों से देख रही हूं मै कि आप अपनी बेटी को कितने प्यार से रख रही हैं।और मैं भी उसकी बुआ हूं। उसके बचपन को ऐसे तो मुरझाने नहीं दूंगी।"भैया चुपचाप सर झुकाए बैठे थे।"कितने दिनों उसका निर्वाह कर सकेंगी आप?"मैंने इस बात का कोई उत्तर नहीं दिया। और चुपचाप रिमझिम का बैग पैक करके अगले दिन उसे लेकर अपने घर आ गई। दो दिनों के बाद मेरी बेंगलुरु की ट्रेन थी। भैया हमसे मिलने स्टेशन पर आए। उन्होंने रिमझिम के हाथों में एक पैकेट थमाया और उसे प्यार किया।रिमझिम काफी खुश नजर आ रही थी। "धन्यवाद, रमा, रिमझिम की मुस्कुराहट लौटाने के लिए। "और हमारी ट्रेन चल पड़ी। एक वह दिन था और एक आज का दिन है। नन्ही रिमझिम आज अपने पैरों पर खड़ी है। एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर ।
तभी अपने कंधे पर किसी के स्पर्श से मैं अपने विचारों से बाहर आई। सामने देखा तो भैया खड़े थे।"किस उलझन में पड़ी है रमा? रिमझिम सही ही तो कह रही है उसका कन्यादान तू ही करेगी।"लेकिन भैया ,रिमझिम आपकी भी तो अकेली बेटी है।"मैं कहां अपने पिता होने के कर्तव्यों को निभा पाया। मैं तो सविता का भी दोषी हूं। तेरे कन्यादान करने से ही रिमझिम की मां की आत्मा को भी शांति मिलेगी"। इतना कह कर भैया कमरे से बाहर चले गए।अब मेरे मन का द्वंद समाप्त हो चुका था। मैं भी कमरे से बाहर जाकर रिमझिम की विवाह की तैयारीयो में जुट गई।
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