सम्मान


शहर के प्रतिष्ठित सभागार में तालियों की गड़गड़ाहट गूंज रही थी। राज्य सरकार द्वारा 'बेस्ट टीचर' का सम्मान पाने वाली अर्चना मेहरा मंच पर खड़ी थीं। उनकी आंखों में खुशी और गर्व के साथ-साथ पुरानी यादों का समंदर भी उमड़ रहा था। उन्होंने माइक के सामने खड़े होकर कहा, "यह सम्मान मेरे अकेले का नहीं है। यह मेरी सासू मां के विश्वास और प्रोत्साहन का परिणाम है।यह पुरस्कार  मै उन्हें समर्पित करती हूं।  उनकी सीख ने मुझे सिखाया कि परिस्थितियां चाहे कैसी भी हों, अपने सपनों को जीने का हौसला कभी नहीं खोना चाहिए।"इसके बाद अर्चना अपने स्थान परआकर बैठ जाती हैं। कार्यक्रम आगे बढ़ता है लेकिन अर्चना अपने अतीत में खो जाती हैं।


अर्चना का जीवन साधारण लेकिन संघर्षों से भरा था। तीन बहनों में सबसे बड़ी अर्चना बचपन से ही पढ़ाई में होशियार थीं। उनका सपना था कि वे एक  शिक्षक बनें। लेकिन उनके माता-पिता ने एक अच्छे घराने से रिश्ता आने पर उनकी पढ़ाई के सपने को नजरअंदाज कर शादी कर दी। उसे आज भी अच्छी  तरह याद है वह दिन जब उसका बी ए फाइनल का परिणाम निकला था।"मां मैं फर्स्ट डिवीजन में पास हो गई। कॉलेज के प्रोफेसर ने कहा है कि मुझे आसानी से बी.एड में एडमिशन मिल जाएगा।"देखो बेटा, अर्चना, बातसमझने की कोशिश करो। हम तुम्हें आगे नहीं पढ़ा सकते। तुम्हारे बाद और भी दो बहनों की शादी करनी है। तुम्हारी बुआ जी ने एक अच्छा रिश्ता बताया है। काफी अच्छा परिवार है। और सबसे बड़ी बात है कि उन लोगों को दहेज भी नहीं चाहिए।"अर्चना को मन मसोस कर शादी करनी पड़ी।ससुराल में, हर कोई पढ़ा-लिखा और नौकरी करता था। उनकी सासू मां प्रोफेसर थीं और जेठानी बैंक में अधिकारी। लेकिन अर्चना का दिन रसोई में बीतता। वह सुबह-सुबह उठकर पूरे परिवार के लिए नाश्ता और टिफिन तैयार करतीं। हर कोई उनके काम को सहज मानता, लेकिन अक्सर यह कह दिया जाता, "तुम तो बस एक घरेलू महिला हो।"एक दिन शाम के समय उसकी जेठानी दफ्तर से लौटते ही अर्चना पर बरस पड़ती है।"कैसा बिना स्वाद का खाना बनाया था।  कितनी बार तुमसे कहा है कि की लंच में मुझे तरी वाली सब्जी मत दिया करो। ऊपर से सब्जी में नमक और मसाले का कोई अता पता ही नहीं था। पराठों में कभी घी बहुत ज्यादा लगा देती हो, किसी दिन घी का कोई पता ही नहीं होता। जाने पूरा दिन घर पर बैठे क्या करती हो? एक दिन बाहर का काम करना पड़े तब समझ आए।अब डिनर थोड़ा ढंग का बना लेना। पूरे मुंह का स्वाद बिगड़ चुका है।"कहकर वह अपने कमरे में चली गई। लेकिन अर्चना की आंखों में आंसू छलक आए। वह कितने मनोयोग से सबके लिए खाना बनाती है। सुबह से शाम तक एक पैर पर खड़ी रहती है। वही सामने सोफे पर बैठी सासू मां सब देख रही थी। उन्होंने भी बड़ी बहू को नहीं टोका। वैसे भी वह थोड़ा गंभीर स्वभाव की महिला थी। उन्होंने अर्चना को अपने पास बुलाया और बैठने का इशारा किया।"मैंने सुना है तुम पढ़ाई में काफी होशियार थी। फिर भी आगे कुछ करने का क्यों नहीं सोचा?"सासू मां की बात सुनकर अर्चना  की आंखों में आंसू छलक आए। उसने कहा, "मैं पढ़ाई करना चाहती थी और शिक्षक बनना चाहती थी, लेकिन अब..." राधा देवी ने उनकी बात काटते हुए कहा, "क्यों नहीं कर सकती? कब तक दूसरों के इशारों पर नाचती रहोगी? अपने जीवन की मालिक खुद बनो।"अर्चना के लिए यह शब्द एक चिंगारी की तरह थे। राधा देवी ने खुद अर्चना का कॉलेज में दाखिला करवाया। घर के काम संभालने के साथ-साथ अर्चना ने पढ़ाई शुरू की। यह आसान नहीं था, लेकिन राधा देवी की प्रेरणा और सख्त अनुशासन ने अर्चना को आगे बढ़ने का हौसला दिया।


डिग्री पूरी करने के बाद, अर्चना ने अपने घर के पीछे बने दो कमरों में एक छोटे स्कूल की शुरुआत की। बाद में किराए पर एक छोटी सी जगह पर स्कूल को आगे बढ़ाया।शुरुआती  दिनों में उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा, लेकिन उनका जुनून अडिग था। धीरे-धीरे, समय बीता।स्कूल की प्रतिष्ठा बढ़ी औरआज  यह शहर के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित स्कूलों में से एक बन गया। संघर्ष में उसकी सासू मां ने उसकापूरा सहयोग किया ।वे अब इस दुनिया में नहीं थीं, लेकिन अर्चना जानती थीं कि उनकी सफलता का आधार वही  थीं।  तभी कार्यक्रम समाप्त हो जाता है।तालियों की गूंज फिर से पूरे सभागार में फैल गई। जिससे अर्चना अपने अतीत से वापस आ जाती है। कुछ लोग उसके पास आकर उसे बधाइयां देने लगते हैं ।

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