बेटियां


शाम का वक्त था।सुनीता चाय का कप लेकर पीने बैठी थी, लेकिन घर की दीवारों से ऊपरी मंजिल पर से आने वाली तेज़ आवाज़ें पूरे माहौल को असहज कर रही थीं। वहां उसकी जेठानी सरिता का परिवार रहता था।सास और बहू के बीच तीखी नोकझोंक हर दिन की बात हो गई थी। वहीं, निचली मंजिल पर बैठी सुनीता चुपचाप उन आवाज़ों को सुनते हुए कब  अपने अतीत के गलियारों में खो गई उसे पता ही नहीं चला।


सुनीता, घर के छोटे बेटे रमेश की पत्नी, इस घर में जब शादी के बाद आई थी। शुरू में घर में सबकुछ ठीक था, लेकिन बेटियों के जन्म के बाद माहौल बदल गया। पहली बेटी के जन्म पर पूरे घर ने मुस्कान भले ही दिखाई, "कोई नहीं अगली बार भगवान तेरी गोद में लल्ला जरूर डालेगा।"सासू मां ने कहकर पता नहीं उसे समझाया या खुद को।पर दूसरी बेटी के आते ही स्थितियां बदल गई। सासू मां के चेहरे पर गहरी मायूसी छा गई। जबकि जेठानी सरिता ने अपने तीखे तानों से सुनीता का जीना मुश्किल कर दिया था।“बेटियां ही बेटियां! देवर जी का वंश कैसे चलेगा? बेटा होता तो कुछ बात होती,” सरिता हर छोटी-बड़ी बात पर सुनीता को सुनाती रहती।अब तो सास भी अक्सर तानों में कहती, “बेटे का सुख किस्मतवालों को मिलता है, सबके नसीब में नहीं होता।” कोई जाननेवाला या रिश्तेदार घर पर आते तो उनके पूछने से पहले ही यह जरूर बताया जाता कि सुनीता को केवल बेटियां ही हैं। जबकि बड़ी बहू दो बेटों की मां है।


सुनीता ने इन बातों को दिल पर ले लिया था, लेकिन उसके पति रमेश ने हमेशा उसका साथ दिया। वह अपनी बेटियों को लेकर गर्व महसूस करता था और कहता, “बेटियां बोझ नहीं, भगवान का आशीर्वाद होती हैं।” रमेश के समर्थन ने सुनीता को हिम्मत दी, और उसने ठान लिया कि वह अपनी बेटियों को ऐसी परवरिश देगी कि वे किसी भी बेटे से कम न हों।समय बीता , धीरे-धीरे दोनों भाइयों का परिवार अलग हो गया बड़े भाई का परिवार ऊपर की मंजिल पर जबकि छोटे का परिवार नीचे रहने लगा। इधर कुछ सुनीता की परवरिश और कुछ ईश्वर का आशीर्वाद उसकी दोनों बेटियां पढ़ाई में अव्वल रहीं। एक डॉक्टर बनी और दूसरी इंजीनियर। वे आत्मनिर्भर और सशक्त थीं, और आज अपनी सफलता के कारण माता-पिता की हर जरूरत का ख्याल रखती थीं। शादी के बाद भी वे हर सप्ताह माता-पिता से मिलने आतीं और उनके लिए हर संभव सुविधा जुटातीं।दूसरी ओर, जेठानी सरिता के दोनों बेटे बड़े होकर स्वार्थी और गैरजिम्मेदार बन गए थे। उनमें से एक ने अपने ही माता-पिता से अलग रहने का फैसला कर लिया था, जबकि दूसरा अक्सर अपनी पत्नी के इशारों पर चलता था। सरिता का जीवन अब तानों और कटाक्षों के बीच उलझ कर रह गया था। वह अपनी बहुओं और बेटों के बीच हर रोज एक नई लड़ाई का सामना करती थी।आज फिर जब सरिता के घर से बहस की आवाज़ें गूंजीं, तो सुनीता ने एक लंबी सांस ली और अपनी छोटी सी दुनिया पर मुस्कुराई। वह मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद देती हुई सोच रही थी,

“बेटा हो या बेटी, सबकुछ परवरिश और संस्कारों पर निर्भर करता है। बेटियां आज मेरा अभिमान हैं, और मुझे गर्व है कि मैंने उन्हें जन्म दिया।” तभी दरवाजे पर गाड़ी  रुकने की आवाज से सुनीता की तंद्रा टूटी।


यादों के उस सफर से लौटकर सुनीता ने खिड़की के बाहर झांका। सामने उसकी बेटियां मुस्कुराते हुए घर की ओर आ रही थीं। सुनीता का दिल गर्व और खुशी से भर गया। उसने अपने मन की सारी पुरानी कड़वाहट को अलविदा कहा और अपनी जिंदगी में बेटियों की अहमियत को फिर से महसूस किया। अंदर घुसते ही छोटी बेटी ने कहा "अरे मां क्या कर रही हो?" कुछ नहीं बस खाने की तैयारी करने जा रही हूं? बोलो क्या खाओगे तुम दोनों?"कोई खाना-वाना नहीं बनाना तुम्हें चलो हम सब शॉपिंग पर चलते हैं और बाहर से बढ़िया मसालेदार डोसा और आइसक्रीम खाकर लौटेंगे।"थोड़ी देर में सुनीता तैयार होकर हंसती बोलती हुई बाहर चली जाती है। जबकि घर में हुए क्लेश से दुखी सरिता आज भूखी ही सो जाती है।कहानी का संदेश स्पष्ट था—बेटा-बेटी में फर्क करने वाले समाज को यह समझना होगा कि सच्ची खुशी और सफलता बच्चों के लिंग में नहीं, बल्कि उनके चरित्र और उनके द्वारा दिए गए सम्मान में होती है।

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