भूख
" यह क्या? नव्या ,आज तुम फिर से लंच बॉक्स ऐसे ही वापस ले आई!"मां मैंने आपसे कितनी बार कहा है ,कि कुछ अच्छा बना कर दिया करो और आप हो कि वही पराठे, पूरियों और चपातियों पर अटकी पड़ी हैं। मुझे नही खाना ऐसा खाना।""अरे बेटा पिछले सप्ताह ही तो तुझे सैंडविच बना कर दिया था। यह फास्ट फूड रोज-रोज खाने की चीज नहीं। एक तो इनसे तेरी सेहत बिगड़ेगी। और बेटा,यह रोज-रोज अन्न का अपमान करना अच्छी बात नहीं।"पल्लवी ने अपनी बेटी नव्या को समझाते हुए कहा। नव्या आठवीं कक्षा में पढ़ती है। एक तो मां-बाप की इकलौती संतान ऊपर से कान्वेंट स्कूल के कल्चर ने उसे थोड़ा जिद्दी बना दिया था। बचा खुचा योगदान उसके पापा का था जो बेटी की एक फरमाइश पर कभी पिज़्ज़ा तो कभी बर्गर ऑर्डर करवा देते थे। इन्हीं सब कारणों से घर के खाने के प्रति नव्या की कोई दिलचस्पी नहीं थी। पल्लवी कई बार नाराज होकर उसे कहती थी एक दिन भूखा रहना पड़े ,तब तुम्हें घर के खाने की अहमियत पता चलेगी। एक दिन नव्या स्कूल से घर आ रही थी, तभी रास्ते में एक गरीब औरत अपने दो छोटे-छोटे बच्चों के साथ सड़क के किनारे बैठी हुई थी।"दीदी कुछ खाने को मिलेगा बड़े जोरों की भूख लगी है।"तभी नव्या के दिमाग में आता है कि उसने तो आज अपना खाना फिर से नहीं खाया है। घर जाकर मम्मी की भाषणबाजी सुनने से तो अच्छा है कि वह खाना इन्हें दे दूं। वह अपने स्कूल बैग में से लंच बॉक्स निकालती है और उसमें रखी चपातीयां और सब्जी उस औरत को दे देती है। खाना देखकर उस औरत और उसके बच्चों के चेहरे पर गजब की चमक आ जाती है। और वे उस खाने पर टूट पड़ते हैं। नव्या के आश्चर्य की कोई सीमा नहीं रहती। क्या इन्हें यह खाना इतना पसंद है! खैर मुझे क्या? मेरे लिए तो इतना ही काफी है कि मम्मी की बातें सुनने से बच जाऊंगी। घर आने पर मम्मी आज उसका खाली लंचबॉक्स देखकर खुश हो गई। वाह बेटा, ऐसे ही रोज अपना लंच खत्म कर दिया करो। नव्या कोई जवाब नहीं देती, मुस्कुरा कर रह जाती है। दो दिन बाद... आज रविवार का दिन था। नव्या के पापा तीन दिनों के बिजनेस टूर पर गए थे। अभी नव्या सो रही थी कि कि उसकी मां घबराई हुई आ कर उसे जगाती है ।"नव्या तेरी नानी बाथरूम में फिसल कर गिर गई है ।उन्हें काफी चोट आई है। उन्हें सिटी हॉस्पिटल लेकर गए हैं । तेरे मामाजी का फोन आया था। मुझे जाना होगा,मैं शाम तक वापस आ जाऊंगी। कामवाली बाई थोड़ी देर मे आती ही होगी मैं रास्ते में उसे फोन कर दूंगी वह तेरे लिए कुछ हल्का-फुल्का बना देगी।"कह कर पम्मी अपनी मां को देखने चली जाती है। इधर जब काम वाली बाई आती है और नव्या से पूछती है कि उसे क्या खाना है? नव्या उसे नूडल्स बनाने के लिए कहती है। किचन में काफी खोजबीन करने के बाद भी नूडल्स नहीं मिलते तो वह कहती है"बेबी लगता है नूडल्स खत्म हो गए हैं। वैसे भी दीदी इन चीजों को ज्यादा पसंद नहीं करती । मैं तुम्हारे लिए रोटियां सेंक देती हूं।"रोटियों का नाम सुनते नव्या नाक भौं सिकोड़ लेती है और कहती है कि आंटी आप रहने दो , मैं पापा से कह कर अपने लिए कुछ आर्डर करवा लूंगी। कामवाली शांताबाई अपने काम समेट कर चली जाती है। थोड़ी देर बाद नव्या अपने पापा को फोन लगाती है लेकिन शायद मीटिंग में होने की वजह से उन्होंने अपना फोन स्विच ऑफ मोड में रखा था।कोई बात नहीं अभी थोड़े कुकीज ले लेती हूं। पापा को थोड़ी देर बाद कॉल करूंगी। वह किचन में जाकर देखती हैं तो डब्बे में केवल चार ही बिस्किट थे। कोई नहीं अभी तो इन्हीं से से काम चला लेती हूं थोड़ी देर में पापा को कॉल करूंगी। नव्या थोड़ी देर बाद फिर से पापा को फोन लगाती है। लेकिन उनका फोन नहीं लगता। ऐसा करते-करते दोपहर के 2:00 बज जाते हैं। अब तक उसे जोरों की भूख लग गई है। अब शाम के 4:00 बज चुके हैं। भूख से बेहाल नव्या सोच रही है कि इससे अच्छा तो आंटी से रोटियां ही सिंकवा लेती। उसे मैगी के अलावा कुछ बनाना भी तो नहीं आता। कभी उसकी आंखों के सामने उसे गरीब औरत और उसके बच्चों का चेहरा आता है। शायद वह भी उस दिन ऐसे ही भूखे थे।कभी, मम्मी ठीक ही कहती है खाने का अपमान नहीं करना चाहिए। नव्या की आंखों में आंसू आ जाते हैं। रात के 8:00 बजे उसकी मम्मी वापस आ जाती है। नव्या अपनी मम्मी से लिपट जाती है। मॉम अब नानी कैसी है? उनके पैरों में हल्का फ्रैक्चर है प्लास्टर लगा दिया है। और अस्पताल से डिस्चार्ज भी कर दिया है।वह घर पर आ गई है। तेरी मामी ने हमारा खाना पैक कर दिया है। उन्होंने जल्दबाजी में चपतियां और घीये की सब्जी बना कर दी है। तू तो यह सब्जी पसंद नहीं करती तो मैं तेरे लिए जीरा आलू बना देती हूं। नहीं मम्मी, मैं खा लूंगी आप रहने दो और जल्दी से फ्रेश हो जाओ तब तक मैं खाना लगाती हूं। पल्लवी आश्चर्य से अपनी बेटी को देखने लगती है कि इसे क्या हुआ है? दोनों मां बेटी मिलकर खाना खाते हैं ।नव्या मां से लिपट कर कहती है कि की मां मैं आज घर के खाने का अपमान नहीं करूंगी। आप जो भी मुझे लंच बॉक्स में बना कर दोगे मैं खुशी से उसे खाऊंगी। 1 दिन की भूख ने आज नव्या को अन्न का महत्व समझा दिया था। उसकी मां बेटी में आए इस बदलाव को देखकर मुस्कुरा उठती है।
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