सबक

 " यह लीजिए ,गाजर का हलवा जरा खा कर तो बताइए कैसा बना है?"रागिनि देवी ने अपने पति उमाकांत जी को गाजर का गरमागरम हलवा देते हुए पूछा ।"अरे भाग्यवान,इसमें कहना ही क्या?अच्छा ही बना होगा एक तो सर्दियों का मौसम ऊपर से तुम्हारे हाथ का स्वाद। लेकिन यह क्या? अपने लिए हलवा लेकर नहीं आई?"मैं फिर खा लूंगी आप खाकर तो बताइए ।" जैसी तुम्हारी इच्छा, भाई मैं तो गाजर के हलवे से आती हुई देसी घी की खुशबू और  पिस्ता बादाम से सजी हुई  कटोरी देख कर अब और इंतजार नहीं कर सकता।"इतना कहकर उमाकांत जी हलवा खाने लगे। रागिनी जी उन्हें हलवा  खाते देखकर मुस्कुरा रही थीं। दरअसल उमाकांत जी को मीठा खाने का बहुत शौक था। रागिनी जी पहले उनके  लिए तरह-तरह के मीठे व्यंजन बनाया करती थी। उमाकांत जी गांव के एक सरकारी स्कूल में अध्यापक थे। बेटे की जिद के कारण उमाकांत जी की









 रिटायरमेंट के बाद वे लोग अपने बेटे बहू के साथ रहने  शहर आ गए थे। बेटा तो अपने माता-पिता को प्रेम करता था लेकिन उसकी पत्नी नेहा उनसे  कुछ खींची खींची सी रहती थी। इसी कारण रागिनी जी बहू की रसोई में  मदद तो कर देती थी लेकिन अपने मन से कुछ भी बनाने में संकोच करती थी। लेकिन आज जब बहू पार्लर जा रही थी तो उसने अपनी सास से दोपहर का खाना बनाकर रखने को कहा। रागिनी जी ने खाना बनाने के बाद थोड़ा गाजर का हलवा भी बना लिया। खैर उमाकांत जी के हलवा खा लेने के बाद किसी का फोन आ गया और वह बातों में लग गए। रागिनी भी अपने लिए एक छोटी कटोरी में हलवा लेकर बैठी ही थी कि उनकी बहू










 नेहा वापस आ गई। उसने एक तिरछी नजर हलवे की कटोरी पर डाली।"यह क्या बनाया है आपने? मैंने तो आपसे केवल दोपहर के खाने के लिए कहा था।" बहू रसोई में ताजे गाजर  पड़े हुए थे तो मैने  थोड़ा गाजर का हलवा बना लिया।वो नवीन के  पापा को  बहुत पसंद है। मैं गांव में उनके लिए हमेशा बनाया करती थी ।"रागिनी ने थोड़ा सकुचाते हुए कहा।ये आपका गांव नहीं है,शहर है। एक तो यहां के खर्चे  आपके आने से वैसे ही काफी बढ़ गए हैं। ऊपर से आपके यह शौक! गाजर के हलवे में इतना घी ,काजू ,बादाम पता भी है कि कितने महंगे आते हैं? एक दिन आप पर घर क्या छोड़ कर गई आप तो खुद को घर की मालकिन ही समझने लगी।"बहू के मुंह से ऐसी बातें सुनकर रागिनी जी सदमे में आ गई। उन्होंने तो सोचा भी नहीं था कि एक हलवे के पीछे बहु उन्हें इतना कुछ सुना देगी। उनकी आंखों में आंसू आ गए और उन्होंने वह हलवे का कटोरा वही रख दिया। तब तक उमाकांत  जी भी फोन रख चुके थे। गुस्सा तो उन्हें बहुत आया पर उन्होंने पत्नी की  आंखों में आए आंसुओं को पोंछते हुए कहा "चिंता ना करो रागनी एक बार नवीन को टूर पर से वापस आ जाने दो फिर हम वापस अपने गांव चल चलेंगे।"दो दिनों के बाद नेहा के मायके से फोन आता है कि उसकी भतीजी का  जन्मदिन है। उसे अपने सास ससुर के साथ आना है। वह अपने साथ उन्हें ले तो नहीं जाना चाहती थी लेकिन मां ने खास तौर पर उन्हें अपने साथ लाने को कहा था तो वह चाहते हुए भी मना नहीं कर पाई और अपने साथ उनलोगों को लेकर  अपने मायके पहुंची। छोटी सी पार्टी थी खास लोगों को ही बुलाया गया था। उसमें भी सभी लोग खाना खा कर अपने घर चले गए। अब केवल नेहा के परिवार वाले, नेहा और उसके  सास ससुर ही बचे थे। रात काफी हो गई थी तो नेहा के पिताजी ने उन्हें रोक लिया था। सभी लोग हाल में बैठे बातचीत कर रहे थे तभी नेहा के पिताजी ने उसकी मां से कहा कि आपने हमारी पसंदीदा रसमलाईयां नहीं मंगवाई क्या? हां हां क्यों नहीं? मैंने आपकी बेटे से कहकर मंगवा रखी है अभी सबके लिए लाती हूं। नेहा की मां के पीछे-पीछे उसकी भाभी  भी किचन में जाती हैं। थोड़ी देर में भाभी की तेज आती आवाजों को सुनकर नेहा भी किचन में आ जाती है।"क्या जरूरत थी आपको रसमलाई मंगाने की। पार्टी में सभी ने मीठा खाया ही था। आप भी न मां जी, जब देखो घर का  बजट बिगाड़ने में लगी रहती हो। बढ़ती महंगाई का कुछ अंदाजा भी है आपको। वैसे ही आप दोनों के खर्चे भारी पड़ रहे हैं हम पर, ऊपर से यह सब।"मां पर ऐसी तेज आवाज में अपनी भाभी को चिल्लाता देख नेहा अपना आपा खो देती है।"बस करो भाभी, किस तरह से बात कर रही हो आप मां से आपको बड़ों से बात करने की तमीज नहीं। और क्या अपने बेटे की कमाई से मां पिताजी अपनी मर्जी का खा पी भी नहीं सकते?"देखा नेहा की मां, हमारी नेहा कितनी समझदार है। लेकिन बेटा, यह जो ज्ञान तुम अपनी भाभी को दे रही हो यह उस दिन कहां गया था जब तुम समधन जी को  गाजर का हलवा बनाने के लिए इतना सुना रही थी।" नेहा के पिताजी ने रसोई में घुसते हुए कहा।"मैंने अपने कानों से सुना है सब। मैंने उस दिन समधी जी को जन्मदिन का न्यौता देने के लिए फोन किया था।  मैं लाइन पर ही था उस दिन जब तुम अपनी सास  का अपमान कर रही थी। अपने माता-पिता का अपमान होते देख तुम्हे बुरा लग रहा है। वे लोग भी तो दामाद जी के माता-पिता है। और तुम्हें सबक सिखाने के लिए ही हमने यह नाटक रचा है।"नेहा शर्म के मारे सर नहीं उठा पा रही थी।उसे अपनी  भूल का अहसास हुआ।उसने अपने  माता पिता और सास ससुर से माफी मांगी और भविष्य में ऐसा न करने का वादा किया। उन्होंने भी  बड़ा दिल दिखाते हुए उसे माफ कर दिया। अब नेहा को एक बड़ा सबक मिल गया है और वह अपने सास ससुर साथ हमेशा प्रेम और सम्मान से पेश आती है।

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