सपना
अंजलि किचन में रात के खाने की तैयारी में जुटी हुई थी। लगता है, तभी दरवाजे पर दस्तक होती है।आरव ट्यूशन से आ गया। सोचते हुए वह दरवाजे की ओर बढ़ी। आ गया बेटा तू ,कहकर वो वापस किचन में चली जाती है।थोड़ी देर बाद आरव किचन में आता है और प्यार से अपनी मां को पकड़कर कहता है कि मां आज खाने में क्या बना रही हो?चपाती,कढ़ाई पनीर,मटर पुलाव और रायता। वाउ,आज तो जी भर कर खाना खाऊंगा। मां उसकी बात सुनकर मुस्कुरा देती है। थोड़ी देर बाद खाने के टेबल परआरव के पापा उससे पूछते हैं कि,आरव तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है?अच्छी चल रही है,पापा। गुड, मैं सोच रहा था कि मेडिकल एंट्रेस की तैयारी के लिए एक और कोचिंग सेंटर में तुम्हारा एडमिशन करवा दिया जाए।वर्मा जी ने अपने बेटे मयंक का एडमिशन वहां करवाया है।कह रहे थे कि पिछले साल वहां का रिजल्ट काफी अच्छा रहा था। लेकिन पापा,मैने आपसे पिछली बार भी कहा था कि मैं नीट की परीक्षा में शामिल नहीं होना चाहता हूं। मैं फैशन डिजाइनिंग करना चाहता हूं।तुम्हारे दिमाग से अभी तक यह फितूर नहीं उतरा ।यह फालतू का दिमाग लगाना छोड़ो। ऐंड कंसंट्रेट ऑन योर नीट एग्जामिनेशन।पापा ने अपनी आवाज को थोड़ा कठोर करते हुए कहा।आरव ने अपने हाथ में लिया हुआ निवाला वापस प्लेट में रख दिया और उठकर अपने कमरे में चला गया।आपको भी खाते समय ही इस टॉपिक पर बात करनी थी , कितने चाव से खाना खाने बैठा था ।भूखा ही उठ गया । तुम्हारे लार प्यार ने ही तो उसे और बिगाड़ दिया है। अंजलि। मेरे पिताजी ने भी मुझे डॉक्टर बनने का सपना देखा था। लेकिन मैंने इतना ध्यान नहीं दिया। उस समय इतनी सुविधा भी नहीं थी। कम से कम यह तो हमारा सपना पूरा करें। और अपने सपनों का बोझ मेरे बच्चे के कंधों पर लाद दो ।अंजलि मन ही मन सोचती है। अंजलि जानती थी की"आरव का सपना है कि वह एक मशहूर फैशन डिजाइनर बने और अपनी रचनात्मकता से दुनिया को चौंका दे। उसे कपड़ों के रंग, डिजाइन और पैटर्न में गहरी दिलचस्पी थी। जब भी वह फैशन शो देखता, उसके अंदर एक अलग सी खुशी होती। वह रात-रात भर स्केच करता, नए-नए डिजाइन तैयार करता और खुद को एक सफल डिजाइनर के रूप में देखता।
लेकिन आरव के पिता की सोच उससे अलग थी। वे चाहते थे कि उनका बेटा डॉक्टर बने। उनके हिसाब से डॉक्टर का पेशा ही सबसे सम्मानजनक और सुरक्षित था। अंजलि ने कई बार अपने पति को समझाने की कोशिश की। लेकिन सारी कोशिशें बेकार । एक दिन अंजलि के पति के पास उनकी एक पुराने मित्र का फोन आता है।"अरे राजीव तुम्हें राहुल शर्मा याद है। हमारे स्कूल के दिनों का दोस्त। वह बहुत बड़ा कलाकार बन गया है। उसके चित्रों की प्रदर्शनी शहर के एक बड़े होटल में लगने वाली है? मैं वहां कल शाम को जा रहा हूं क्या तुम भी चलना चाहोगे?"राजीव की चित्रकला में तो कोई विशेष रुचि तो नहीं थी लेकिन स्कूल के पुराने दोस्त से मिलने की चाह में उसने हां कर दी। अगले दिन शाम को अपने मित्र के साथ उस होटल में गए जहां कला प्रदर्शनी लगने वाली थी। वहां पहुंचकर उन्हें काफी आश्चर्य हुआ क्योंकि प्रदर्शनी में शहर के नामी गिरामी लोग शामिल हुए थे। वहां राहुल को सम्मानित किया गया। उसके महंगे पेंटिंग्स को खरीदने वाली शहर की बड़ी हस्तियां थी। राहुल अपने पुराने मित्रों से मिलकर काफी प्रसन्न हए। प्रदर्शनी की भीड़ थोड़ी कम हुई तो वह तीनों मित्र एक कोने में बैठे बातें करने लगे। अरे यार राहुल , तुम तो बहुत बड़े आदमी बन गए। स्कूल के दिनों में किसीने सोचा भी नहीं था कि तुम इतने सफल आदमी बनोगे ।पढ़ाई में तो तुम औसत ही थे। हां यार सही कहा तुमलोगों ने। मेरी सफलता के पीछे मेरे माता-पिता का हाथ है। पढ़ाई में मैं वाकई औसत ही था लेकिन शुरू से ही मेरी रुचि चित्रकला में थी जिसे मेरे बाबूजी ने पहचाना। और मुझे इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। मैंने चित्रकला में ही अपनी आगे की पढ़ाई पूरी की और उसका नतीजा तुम देख ही रहे हो। माता-पिता का कर्तव्य है कि बच्चों की रुचि को पहचान उसे क्षेत्र में उन्हें आगे बढ़ने में मदद करें न की बच्चों पर जबरनअपनी इच्छा को थोपे। खैर अपने दोस्त से मिलकर आरव के पिता अपने घर लौट आए। लेकिन वह देर रात तक यह सोचने पर मजबूर हो गए की क्या मैं आरव पर अपने सपनों का बोझ लाद कर सही कर रहा हूं? मुझे भी तो स्कूल के दिनों में क्रिकेट खेलने का बड़ा शौक था।अपनी स्कूल टीम का कप्तान भी रह चुका था मैं।लेकिन पिताजी को खेलकूद पसंद नहीं था।उन्हें लगता था कि इससे पढ़ाई का नुकसान होगा।कितना मन मसोस कर क्रिकेट को अलविदा कहा था मैने। क्रिकेट ना छोरा होता तो क्या पता आज..।खैर ऐसा ना हो कि मेरी जिद के आगे आरव कहीं का ना रहे। अगली सुबह वह अंजलि को बेटे का मनपसंद नाश्ता बनाने को कहते हैं। नाश्ते की टेबल पर.. मैं सोच रहा था की आरव का एडमिशन फैशन डिजाइनिंग की तैयारी करवाने वाले इंस्टिट्यूट में करवा दिया जाए। क्यों बेटा अब तो तुम खुश हो ना? आरव और अंजलि आश्चर्य से एक दूसरे का मुंह देखने लगतेहैं। आरव को पिता में आए इस बदलाव का कारण तो नहीं पता लेकिन वह खुश होकर पिताजी के गले लग जाता है। अंजलि भी पिता और पुत्र के इस मेल को देखकर मुस्कुरा उठती है।
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