परंपरा
"शांति देवी एक मध्यमवर्गीय परिवार की महिला थीं। उनका एक बेटा, राजेश, और बेटी, नीरा, थी। कुछ दिनों पहले, राजेश की शादी संगीता से हुई थी। वह एक पारंपरिक विचारों वाली महिला थी जबकि उनकी बहू संगीता मॉडर्न अप्रोच के साथ-साथ एक सुलझी हुई लड़की थी। संगीता की शादी को6 महीने होने को आए थे। संगीता अपनी सास के कहे अनुसार घर में साड़ियां ही पहनती थी। क्योंकि यही उनके घर की परंपरा थी। साड़ी पहनकर काम करने में उसे परेशानी का अनुभव तो होता था। लेकिन अब तेज गर्मी पड़नी शुरू हो गई थी। ऐसे में साड़ी पहन कर किचन में काम करना काफी मुश्किल हो रहा था। बस एक दिन..
संगीता ने सुबह-सुबह साड़ी की जगह सलवार-कुर्ता पहन लिया। शांति देवी ने देखते ही अपनी चश्मा उठाया और माथे पर बल डालते हुए बोलीं, "आजकल की बहुएं तो समझती ही नहीं। बहुओं ने साड़ी पहनी हो, तो घर में रौनक लगती है। ये सलवार-कुर्ता मायके वालों के घर में पहनने के लिए होते है
संगीता ने यह सुना, लेकिन मुस्कुराते हुए बोली, "माँजी, आज गर्मी बहुत ज्यादा है । तो सलवार कुर्ता थोड़ा आरामदायक है इसमें मैं घर का काम भी जल्दी निपटा लूंगी और आराम भी मिलेगा। वैसे भी, मांजी , जमाना बदल रहा है।"
लेकिन शांति देवी कहाँ रुकने वाली थीं! उन्होंने तुरंतअपनी बिटिया नीरा को फोन किया और गॉसिप का सिलसिला शुरू हो गया। "नीरा, तेरी भाभी ने आज सलवार-कुर्ता पहन लिया। अब तू ही बता, क्या ऐसा होता है? हमारी पीढ़ी में बहुएं साड़ी के बिना घर से बाहर कदम नहीं रखती थीं।"
नीरा ने भी अपनी ओर से तड़का लगाया, "अरे माँ, आजकल की लड़कियां बस फैशन दिखाने में लगी रहती हैं। उन्हें पारंपरिक चीजों की कद्र ही नहीं है। मुझे देखो मैं तो हमेशा साड़ियां ही डालती हूं।मां,वह खाना वाना सही से बनाती है की नहीं?"
शांति देवी के चेहरे पर चिंता की लकीरें और गहरी हो गईं, "हां, हां! अब तो वो अपने काम भी आराम से करती है। जब मन होता है, तब उठती है, और वो भी मोबाइल हाथ में लिए। आज सब्जी में नमक कम डाल दिया, मैंने टोका तो मुझे ही कह रही थी कि ‘आजकल नमक कम खाना चाहिए, माँजी!’ अब तू ही बता, मैं सारा जीवन नमक डालती रही हूँ और कुछ नहीं हुआ।"
नीरा और शांति देवी का ये गॉसिप करीब आधे घंटे चला। लेकिन, संगीता ने ये बातें सुन ली थीं। पहले तो उसे बहुत बुरा लगा।वह सोचने लगी ऐसे तो हमारे रिश्तो में दरार आ जायेगी ? कैसे इन रिश्तों में मिठास लाई जाए। उसने मन ही मन कुछ सोचा।
अगले सप्ताह से गर्मी की छुट्टियां शुरू होनेवाली थी। नीरा अपने बच्चों को लेकर मायके आ रही थी । शांति देवी सुबह से ही बेटी के आने की खुशी में चहक रही थीं। संगीता के पति स्टेशन से अपनी बहन और उनके बच्चों को लेकर घर आए। अरे दीदी आ गई आप।संगीता ने खुले मन से नीरा का स्वागत किया। चाय पानी देने के बाद उसने नीरा से कहा कि आप लोग नहा धोकर फ्रेश हो जाइए तो मैं आपका खाना लगती हूं। नीरा नहाने के लिए अपने बैग से साड़ियां निकालने लगी तभी संगीता वहां हाथ में कपड़े लेकर आती है और कहती है कि दीदी आपको साड़ियां निकालने की जरूरत नहीं ।आप यह सूट पहन लीजिए। सूट! लेकिन, अरे दीदी लेकिन लेकिन वेकिन कुछ नहीं इतनी गर्मियों में यह भारी साड़ियां कौन पहनता है? आप जब तक यहां है ।सूट ही पहना करिए आपको आराम लगेगा। नीरा तैयार होकर नीचे आती है। आज उसे इतने दिनों बाद सूट पहन कर काफी हल्का महसूस हो रहा था। सभी एक साथ बैठ कर दोपहर का खाना खाते हैं संगीता ने खाने में कई प्रकार के व्यंजन बनाए थे। बच्चे मामी के हाथ का स्वादिष्ट खाना खाकर खूब चहक रहे थे।अगले दिन सभी बैठकर सुबह की चाय पी रहे थे तभी उनकी घरेलू डॉक्टर साहब आते हैं। और संगीता के ससुरजी का ब्लड प्रेशर चेक करके कहते हैं। अब आपका ब्लड प्रेशर बिल्कुल नॉर्मल है। ऐसे ही परहेज से खाना खाएंगे और हल्का नमक ही प्रयोग कीजिएगा ताकि आपका ब्लड प्रेशर फिर से ना बढ़े। नीरा आश्चर्य से मां की ओर देखने लगती है। थोड़ी देर बाद शांति देवी के कमरे में .. मां आपने मुझे बताया नहीं की पिताजी का ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ था इसलिए भाभी खाने में कम नमक डालती है। और आप उनकी शिकायत मुझसे करते रहते हो उन्होंने तो यह घर भी काफी अच्छे से संभाला हुआ है। और हां आज के बाद आप उन पर साड़ियां पहनने का दबाव भी मत डालना। सलवार कमीज में भी कोई बुराई नहीं है। मान लीजिए वह हमेशा साड़ियां ही पहने लेकिन घर की जिम्मेदारी ढंग से ना निभाए आप सभी को अपना ना समझे तो क्या फायदा ऐसी परंपरा निभाने का। शांति देवी को भी अपनी गलतियों का एहसास होता है और वह कहती हैं तू सही कहती है बेटा, बदलते जमाने के साथ मुझे भी बदलना होगा। आज से मैं बहू को ऐसी छोटी-छोटी बातों के लिए रोक-टोक नहीं करूंगी। तभी किसी काम से कमरे में आ रही संगीता के कानों में मां बेटी की ये बाते पड़ती हैं, तो वह चैन की सांस लेती है।
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