निर्णय

 अरे पूर्णिमा बेटी मान क्यों नहीं जाती अपने बेटे और बहू की बात। लेकिन अम्मा, लेकिन क्या? आखिर इकलौता बेटा है वह तुम्हारा ,बाद में सारी संपत्ति उसकी ही तो होगी। अम्मा, आप सो जाओ ।काफी रात हो गई है, आपकी तबीयत बिगड़ जाएगी। पूर्णिमा जी अपनी 80 वर्षीय वृद्ध सास से इस विषय पर और बात नहीं करना चाहती थी।

अम्मा तो सो गई लेकिन पूर्णिमा जी की आंखों में नींद नहीं थी ।वह अतीत की स्मृतियों में खो गई। आज से 25 वर्ष पहले जब उनके ससुर जी की मृत्यु हुई थी तब से लेकर आज तक उन्होंने अम्मा को ऐसे सहेज रखा था जैसे वह उनकी सास न होकर कोई छोटी बालिका हैं ।उम्र के इस पड़ाव में जीवनसाथी से अलगाव के बाद यदि बच्चे साथ ना दे तो अकेलेपन का यह दंश जीवन को कितना कठिन बना देता है। इस बात को अच्छी तरह समझती थी पूर्णिमा। इसलिए उसने अम्मा को आज तक किसी बात की कोई कमी नहीं होने दी।

पूर्णिमा के पति रमेश जी एक सरकारी बैंक में मैनेजर थे।  दोनों का इकलौता बेटा था सौरभ,मां बाप ने बड़े ही लाड दुलार से उसका पालन पोषण किया था। सौरभ के एमबीए कंप्लीट करते ही एक अच्छी कंपनी में उसकी नौकरी लग गई ।रमेश जी और पूर्णिमा ने अपने इकलौते बेटे के लिए आरुषि को पसंद किया और धूमधाम से उनकी शादी करवा दी गई। शुरुआत के चार-पांच सालों तक तो सब कुछ ठीक रहा लेकिन एक दिन अचानक बैंक से लौटते समय सड़क हादसे में रमेश जी की मौत हो जाती है। उनकी मृत्यु के कुछ दिनों बाद एक दिन सौरभ और आरुषि पूर्णिमा जी के कमरे में आते हैं और आरुषि कहती है की मां मैं यह सोच रही थी कि क्यों न घर आप मेरे नाम कर दें और बैंक अकाउंट वगैरह की जिम्मेदारी सौरभ को देकर निश्चित हो जाए ।पूर्णिमा जीआरुषि की बात सुनकर सन्न रह जाती हैं फिर खुद को संभालते हुए स्पष्ट शब्दों में मन कर देती हैं। बेटेऔर बहू के कमरे से जाने के बाद पूर्णिमा सोचने लगती है कि कितने अरमानों का गला घोटकर कितनी लगन से मैने और मेरे पति ने यह घर खड़ा किया और आज मेरे पति के जाते ही ये बच्चे मुझे मेरे इस अधिकार से भी वंचित करना चाहते हैं।ऐसे स्वार्थी बेटे बहू का क्या भरोसा कि मैं अपना घर उनके नाम कर दूं और कल को मुझे ही अम्मा को लेकर दर दर की ठोकरें खानी पड़े।

उसे दिन के बाद से आरुषि का व्यवहार पूर्णिमा के प्रति बदलने लगता है।अब तो वह उन्हें बात-बात में ताने देने और ऊंची आवाज में बात करने से भी परहेज नहीं करती। सौरभ भी उसे कुछ नहीं कहता ।पति के असामयिक मृत्यु से दुखी पूर्णिमा जी बेटे बहू के व्यवहार से और टूट जाती हैं। आज अपना ही घर उन्हें पराया सा लगने लगता है।

इसी बीच एक दिन बूढ़ी अम्मा भी भगवान को प्यारी हो जाती हैं ।पूर्णिमा जी उनके अंतिम संस्कार और सभी रीति-रिवाजों से निपटने के बाद एक दिन अपने बेटे बहु को बुलाती हैं और कहती हैं कि यह घर और सारी संपत्ति मैंने एक ट्रस्ट के नाम कर दी है। एक महीने के अंदर यह घर एक वृद्धआश्रम में तब्दील हो जाएगा और मैं अपना बाकी समय अपने हम उम्र लोगों के साथ बिताऊंगी। तुम लोग एक सप्ताह के अंदर ही अपने लिए कोई व्यवस्था कर लो। पूर्णिमा जी  अपने चेहरे पर अडिग भाव लिए हुए अपना निर्णय सुना कर अपने कमरे में चली जाती हैं। सौरभ और आरुषि सन्न होकर उन्हें देखते ही रह जाते हैं।


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