घूंघट

                    घूंघट

अरे, छोटी बहू  कितनी बार कहा है तुम्हें, सिर पर घूंघट रखा करो। सावित्री जी ने छोटी बहू रिद्धिमा को कड़कती आवाज में कहा। जाने इस लड़की को क्या सिखाया है इसके मां बाप ने ,कैसे संस्कार दिए हैं। सावित्री जी के दो बेटे हैं, बड़ा बेटा और बहू उनके साथ ही रहते हैं। बड़ी बहू, सासु मां की इच्छा अनुसार सिर पर घूंघट डाले रहती है और परंपरागत विचारों वाली सावित्री जी उस पर बड़ी खुश रहती है। कितने अच्छे संस्कार दिए हैं इसके माता-पिता ने ऐसी होती हैं बहुएं।उनकी बात सुनकर उनके पति रमेश जी केवल मुस्कुरा कर रह जाते। छोटी बहू रिद्धिमा अपने पति के साथ शहर में रहती थी और एक प्राइवेट बैंक में काम करती थी। शहरी परिवेश में पालन-पोषण होने की वजह से वह गांव के परंपरागत रीति-रिवाजों को थोड़ा कम समझती थी लेकिन बड़ों का सम्मान करना उसे अच्छी तरह आता था । सावित्री जी द्वारा उसके माता-पिता के दिए गए संस्कारों में कमी की बात सुनकर वह अक्सर सोचती कि क्या सिर पर घूंघट रखना ही संस्कारों का पैमाना है? लेकिन वह कुछ बोलती नहीं थी, छुट्टियां  खत्म होने के बाद वह अपने पति के साथ शहर लौट गई। सभी अपनी अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गए तभी एक दिन  नहाते समय सावित्री जी का पैर फिसल जाता है और वह गिर जाती है।  उन्हें काफी चोट आती है। अस्पताल ले जाने पर पता चलता है कि उनके कमर की हड्डी टूट गई है। डॉक्टर बताते हैं कि सावित्री जी को कुछ महीनों तक बिस्तर पर ही रहना पड़ेगा आप लोग चाहे तो तीन-चार दिनों बाद इन्हें घर ले जा सकते हैं ।लेकिन वहां आपको इनकी पूरी देखभाल करनी पड़ेगी,अगर आप लोग चाहे तो इन्हें अस्पताल में भी रख सकते हैं, मैं इनके लिए नर्स की व्यवस्था करा दूंगा जो इनकी देखभाल कर लेगी। सावित्री जी को अस्पताल के माहौल में घुटन सी महसूस हो रही थी उन्होंने कहा नहीं नहीं ,मैं घर जाऊंगी ।वहां मेरी बहू है मेरी देखभाल करने के लिए। बड़ी बहू बीच में ही बोलती है लेकिन मां जी मुझे तो अपने मामा की बेटी की शादी में जाना है। नहीं जाऊंगी तो मामी जी बुरा मान जाएंगी,आप चिंता ना करें अस्पताल में भी आपकी अच्छी देखभाल हो जाएगी। सावित्री जी ने कहा कुछ नहीं लेकिन उनके चेहरे से निराशा साफ झलक रही थी। उनके पति रमेश जी को छोड़कर बाकी सभी लोग घर चले गए। अगली सुबह सावित्री जी आंखें बंद किए अस्पताल के बेड पर लेटी हुई जाने क्या सोच रही थी ,तभी किसी के स्पर्श से उनकी आंख खुली ।"मां"अरे, छोटी बहू ! हां मां, पापा ने मुझे कल शाम ही फोन करके बताया ,अब मैं आ गई हूं आपके पास, आप जल्दी ही ठीक हो जाएंगी। और हां आप यहां नहीं रहेंगी। मैं घर पर ही आपकी पूरी देखभाल करूंगी। लेकिन बहू तुम्हारी नौकरी ,सावित्री जी ने भरे गले से कहा। मैं लम्बी छुट्टी का एप्लीकेशन दे कर आई हूं ,जब तक आप ठीक नहीं हो जाएंगी मैं आपके पास ही रहूंगी। सावित्री जी विस्मय भरे सजल आंखों से अपने पति की ओर देख रही थीं जो पास ही खड़े मुस्कुरा रहे थे। अब प्रश्न सावित्री जी के मन में था कि क्या घुंघट लेना ही संस्कार का पैमाना होता है?






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